October 31, 2026 1:47 am
Home » समाज-संस्कृति » ‘मैं दिमागी नक्सल हूं, सब याद रखा जाएगा’

‘मैं दिमागी नक्सल हूं, सब याद रखा जाएगा’

जामिया छात्रों के समर्थन में नसीरुद्दीन शाह ने मोदी सरकार को घेरा। खुद को दिमागी नक्सल बताया तो किरेन रिजिजू ने उन्हें खतरनाक अर्बन नक्सल कहा। जानिए पूरा विवाद।

नसीरुद्दीन शाह का मोदी सरकार को दोटूक संदेश; किरेन रिजिजू ने बताया लोकतंत्र के लिए खतरनाक

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों के समर्थन में उतरे 76 वर्षीय अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने केंद्र सरकार, गोदी मीडिया और बीजेपी आईटी सेल पर तीखा हमला बोला है। उनके बयान के बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने उन्हें ‘खतरनाक अर्बन दिमागी नक्सल’ करार दिया। सवाल यह है कि छात्रों के समर्थन में उठी एक अभिनेता की आवाज से सत्ता को इतनी आपत्ति क्यों है?

हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह एक बार फिर अपने बेबाक राजनीतिक बयानों को लेकर चर्चा में हैं। 76 साल के शाह ने दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया के आंदोलनरत छात्रों के समर्थन में एक वीडियो जारी कर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को सीधे निशाने पर लिया है। उन्होंने खुद को गर्व से ‘दिमागी नक्सल’ बताते हुए कहा कि देश के नौजवानों, शिक्षा संस्थानों और लोकतंत्र के साथ जो कुछ हो रहा है, उसे याद रखा जाएगा।

नसीरुद्दीन शाह का यह बयान केवल जामिया के छात्रों के समर्थन तक सीमित नहीं है। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (SRFTI) और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों के आंदोलनों तथा उनके साथ हुए व्यवहार का जिक्र करते हुए सरकार से सवाल पूछे।

‘सब याद रखा जाएगा’: नसीरुद्दीन शाह ने सरकार को दी चुनौती

अपने वीडियो में नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि सरकार देश के नौजवानों का हौसला तोड़ने और शिक्षा संस्थानों को कमजोर करने के लिए कितनी दूर तक जाएगी? उन्होंने सवाल किया कि छात्रों की आवाज दबाने के लिए आखिर कितने हथकंडे अपनाए जाएंगे।

शाह ने कहा कि पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, फिर सत्यजीत रे फिल्म इंस्टीट्यूट और अब जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों के साथ जो कुछ हो रहा है, वह भुलाया नहीं जाएगा।

उन्होंने मीडिया के एक हिस्से और बीजेपी आईटी सेल पर भी निशाना साधा। उनका आरोप था कि सरकार के आलोचकों को बदनाम करने और उनकी आवाज दबाने के लिए लगातार अभियान चलाए जाते हैं।

शाह ने साफ शब्दों में कहा कि चाहे जितनी ताकत लगा ली जाए, देश के नौजवानों का हौसला टूटने वाला नहीं है। न शिक्षा संस्थानों को बर्बाद होने दिया जाएगा और न लोकतंत्र के लिए उठने वाली आवाजें आसानी से खामोश होंगी।

अपने संदेश के अंत में उन्होंने देश के नौजवानों को सलाम किया और कहा कि उनकी सारी दुआएं आंदोलनरत छात्रों के साथ हैं।

किरेन रिजिजू का पलटवार: ‘नसीरुद्दीन शाह खतरनाक अर्बन दिमागी नक्सल’

नसीरुद्दीन शाह के वीडियो पर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू की प्रतिक्रिया ने इस विवाद को और बड़ा बना दिया।

संसदीय कार्य मंत्री और अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि वह पहले नसीरुद्दीन शाह को एक सामान्य अभिनेता समझते थे और उनका सम्मान भी करते थे। लेकिन अब उन्हें पता चला है कि शाह एक ‘खतरनाक अर्बन दिमागी नक्सल’ हैं और भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद नुकसानदायक हैं।

रिजिजू की इस टिप्पणी ने एक नई बहस खड़ी कर दी है। सवाल यह है कि क्या सरकार की नीतियों की आलोचना करना, छात्रों के आंदोलन का समर्थन करना और लोकतंत्र से जुड़े सवाल उठाना किसी कलाकार को इस तरह के राजनीतिक ठप्पे लगाने का आधार बन सकता है?

एक वरिष्ठ अभिनेता के राजनीतिक विचारों से असहमति होना अलग बात है, लेकिन किसी सार्वजनिक व्यक्ति के सवालों का जवाब देने के बजाय उसे खतरनाक करार देना अपने आप में बहस का विषय है।

नसीरुद्दीन शाह अकेले नहीं, कलाकारों के बीच भी बंटी प्रतिक्रियाएं

नसीरुद्दीन शाह के बयान के बाद फिल्म और राजनीतिक जगत से भी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। अभिनेता पुनीत इस्सर ने शाह की टिप्पणी पर आपत्ति जताई, जबकि केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी उन पर सीधा हमला किया।

इससे पहले भी शाह के राजनीतिक बयानों को लेकर फिल्म जगत में मतभेद सामने आते रहे हैं। कंगना रनौत और गजेंद्र चौहान जैसे कलाकारों के साथ उनके विचारों को लेकर सार्वजनिक बहस होती रही है।

यह पूरा घटनाक्रम एक बड़े सवाल की ओर ध्यान खींचता है: क्या कलाकारों को सरकार की नीतियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं होना चाहिए? क्या किसी कलाकार की पहचान केवल उसकी फिल्मों और अभिनय तक सीमित रहनी चाहिए?

लोकतंत्र में असहमति और आलोचना की जगह को लेकर यह बहस लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।

‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ वाले नसीर की याद दिलाता है यह अंदाज

नसीरुद्दीन शाह के इस वीडियो को देखकर उनकी 1980 के दशक की चर्चित फिल्म ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ की याद आना स्वाभाविक है। फिल्म में उन्होंने एक ऐसे किरदार को निभाया था जो अपने आसपास की सामाजिक और आर्थिक विसंगतियों पर गुस्सा जाहिर करता है।

आज भी शाह अपने राजनीतिक वक्तव्यों में उसी बेबाकी और तीखेपन के साथ सवाल उठाते दिखाई देते हैं। फर्क इतना है कि इस बार उनके निशाने पर फिल्म का कोई काल्पनिक किरदार या व्यवस्था नहीं, बल्कि देश की मौजूदा राजनीतिक सत्ता और छात्रों के आंदोलनों से जुड़े सवाल हैं।

असहमति को ठप्पों से जवाब देना कितना उचित?

नसीरुद्दीन शाह के बयान से असहमति रखने वालों को भी अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू यह है कि जामिया, जेएनयू और दूसरे शिक्षण संस्थानों में छात्रों के आंदोलन, उनकी मांगों और विश्वविद्यालयों में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सवालों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।

जामिया के छात्र संघ की बहाली की मांग और विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ छात्रों के टकराव ने एक बार फिर कैंपस में छात्र प्रतिनिधित्व के सवाल को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ऐसे में किसी कलाकार के बयान पर राजनीतिक बहस होने के साथ-साथ छात्रों की वास्तविक मांगों पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है।

नसीरुद्दीन शाह ने अपने वीडियो में कहा कि नौजवानों का हौसला नहीं टूटेगा और जो कुछ हो रहा है, वह याद रखा जाएगा।

उनके इस बयान और किरेन रिजिजू की प्रतिक्रिया ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछने वालों के लिए कितनी जगह है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

Read more
View all posts

तिरछी नजर

ताजा खबर