मस्जिद पर भी संकट; मंदिर और उजड़े परिवारों की कहानी
दिल्ली के रेस कोर्स इलाके में बेदखली की कार्रवाई के बाद सैकड़ों परिवारों के सामने रोज़गार, बच्चों की पढ़ाई और बुनियादी सुविधाओं का संकट है। इसी इलाके में स्थित ऐतिहासिक मस्जिद में नमाज़ पर रोक और पानी-बिजली के कनेक्शन काटे जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं। बेबाक भाषा की ग्राउंड रिपोर्ट में विस्थापित परिवारों ने अपना दर्द बयां किया।
प्रधानमंत्री आवास से कुछ ही दूरी पर स्थित दिल्ली के रेस कोर्स इलाके में बुलडोजर कार्रवाई ने सैकड़ों परिवारों को बेघर कर दिया है। जिन गलियों में कभी बच्चों की आवाजाही थी, जिन घरों में परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी चलती थी, वहां अब मलबा और सन्नाटा है। दूसरी ओर, इसी परिसर में मौजूद ऐतिहासिक रेस कोर्स मस्जिद को लेकर भी विवाद गहरा गया है। मस्जिद के प्रतिनिधियों ने पानी-बिजली काटे जाने और परिसर खाली करने के नोटिस की शिकायत की है। स्थानीय लोगों ने दुर्गा मंदिर के भविष्य को लेकर भी चिंता जताई है।
बेबाक भाषा की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आई तस्वीर सिर्फ बुलडोजर कार्रवाई की नहीं, बल्कि उन परिवारों की भी है जिनके लिए घर छिनने के बाद स्कूल, कामकाज, इलाज और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है।
रेस कोर्स मस्जिद पर संकट, पानी-बिजली काटने की शिकायत
रेस कोर्स मस्जिद को लेकर अक्टूबर में विवाद उस समय बढ़ा, जब मस्जिद के इमाम और प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि परिसर की बिजली और पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई है। मस्जिद तक लोगों की आवाजाही भी प्रतिबंधित किए जाने की शिकायत सामने आई। इमाम के मुताबिक, परिसर खाली करने के लिए छह दिन का नोटिस दिया गया था।
मस्जिद के प्रतिनिधियों का कहना है कि इसके ऐतिहासिक और वक्फ संपत्ति होने से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं। उन्होंने प्रशासन से मस्जिद की सुरक्षा और पानी-बिजली की आपूर्ति बहाल करने की मांग की है।
दूसरी ओर, भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) की ओर से जमीन को सरकारी बताते हुए अनधिकृत कब्जे का सवाल उठाया गया है। इस विवाद में जमीन की कानूनी स्थिति, मस्जिद के दर्जे और परिसर पर लागू कार्रवाई की सीमा अहम सवाल हैं।
21 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली वक्फ बोर्ड ने भी मस्जिद की सुरक्षा और आवश्यक सेवाओं की बहाली के लिए अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग की थी। हालांकि, मस्जिद को गिराने के किसी अंतिम आदेश की स्थिति और संबंधित अधिकारियों के अलग-अलग दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
130 साल पुरानी मस्जिद और दुर्गा मंदिर को लेकर सवाल
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान मस्जिद परिसर के पास बुलडोजर और सुरक्षा व्यवस्था दिखाई दी। स्थानीय लोगों ने आशंका जताई कि कार्रवाई का असर मस्जिद और पास स्थित दुर्गा मंदिर पर भी पड़ सकता है।
एक स्थानीय महिला ने सवाल उठाया कि जब परिसर में मस्जिद और मंदिर दोनों हैं, तो कार्रवाई को लेकर धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित क्यों नहीं की जा रही है। मंदिर में लंबे समय से रहने और पूजा-पाठ से जुड़े लोगों ने भी चिंता जताई। मस्जिद को करीब 130 साल पुराना बताया जाता है।
800 घरों के उजड़ने का दावा, सैकड़ों परिवारों पर असर
6 और 7 अक्टूबर के आसपास इलाके में बड़े पैमाने पर घर हटाए गए। स्थानीय लोगों ने दावा किया कि करीब 800 घर तोड़े गए और प्रभावित परिवारों को मूल स्थान से लगभग 45 से 55 किलोमीटर दूर सावदा-घेवरा की ओर भेजा गया।
कुछ निवासियों ने बताया कि वे कई दशकों से इस इलाके में रह रहे थे। एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि उसके परिवार का इस क्षेत्र से संबंध कई पीढ़ियों पुराना है। कुछ लोगों ने अपने परिवारों के यहां लंबे समय से रहने और काम करने की बात कही।
प्रभावित लोगों का आरोप है कि पुनर्वास स्थल पर पहुंचने के बाद रोजगार, परिवहन, अस्पताल और बच्चों की पढ़ाई जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करना मुश्किल हो गया है।
एक निवासी ने कहा कि परिवारों को ऐसी जगह भेज दिया गया है, जहां उनके लिए काम के अवसर सीमित हैं। उनके मुताबिक, घर तोड़ने के बाद केवल वैकल्पिक जगह देना पर्याप्त नहीं है; वहां सम्मानजनक जीवन जीने की सुविधाएं भी होनी चाहिए।
प्रभावित परिवारों की संख्या और ध्वस्त घरों की कुल संख्या के बारे में अलग-अलग दावे सामने आए हैं। इसलिए अंतिम आंकड़े की पुष्टि संबंधित प्रशासनिक रिकॉर्ड और स्वतंत्र सर्वेक्षण से होनी चाहिए।
‘हम कीड़े-मकोड़े हैं, हमारी सुनवाई कौन करेगा?’
सबसे मार्मिक उन महिलाओं की पीड़ा है, जिनकी आजीविका और पारिवारिक व्यवस्था घर उजड़ने के बाद बिखर गई है। एक महिला ने बताया कि वह लगभग 32 वर्षों से इस इलाके में रह रही थी। वह घरों में काम करके अपने बच्चों का पालन-पोषण करती थी। घर छिनने के बाद उसका काम भी छूट गया।
महिला ने दर्द के साथ कहा, ‘जब उसी के सब चीज हैं, तो हमारे कीड़े-मकोड़े की क्या सुनवाई लेगा? हम लोग तो कीड़े-मकोड़े हैं।’
यह बयान केवल एक व्यक्ति की बेबसी नहीं, बल्कि उन परिवारों की चिंता को सामने लाता है जो अपने घर, काम और पुराने सामाजिक परिवेश से एक साथ दूर हो गए हैं।
महिला के मुताबिक, अब वह अपने बच्चों को लेकर दिनभर पुराने इलाके के आसपास बैठती है और स्कूल की छुट्टी होने पर उन्हें साथ लेकर लौटती है। उसका कहना है कि नई जगह पर काम मिलना मुश्किल हो गया है और परिवार के खर्च चलाने का कोई स्थायी रास्ता नहीं बचा है।
बच्चों की पढ़ाई पर असर, स्कूल पहुंचने में लग रहे दो घंटे
बेदखली का असर बच्चों की शिक्षा पर भी दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट में एक छात्रा ने बताया कि वह पहले मस्जिद के पास रहती थी और अब स्कूल पहुंचने के लिए सुबह करीब छह बजे निकलना पड़ता है। उसके मुताबिक, आने-जाने में डेढ़ से दो घंटे लग जाते हैं।
बच्चों के परिवारों का कहना है कि घर बदलने के बाद स्कूल तक पहुंचना कठिन हो गया है। कुछ बच्चों की पढ़ाई छूटी है, जबकि कुछ को स्कूल और घर के बीच लंबी यात्रा करनी पड़ रही है।
एक अभिभावक ने बताया कि उनके बच्चे अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते हैं और अब उन्हें लाने-ले जाने में अधिक समय और पैसा खर्च होता है।
यह स्थिति पुनर्वास की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाती है। किसी परिवार को वैकल्पिक आवास देने के साथ यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो और स्कूल तक पहुंचने के साधन उपलब्ध हों।
सावदा-घेवरा में रोजगार और अस्पताल की चिंता
प्रभावित परिवारों ने पुनर्वास स्थल पर बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायत की। एक निवासी ने कहा कि वहां रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं हैं और अस्पताल तक पहुंचना भी कठिन है। उन्होंने दावा किया कि पुनर्वास स्थल पर हाल के दिनों में तीन लोगों की मौत हुई है और अस्पताल की कमी एक बड़ी समस्या है। इन मौतों के कारणों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
परिवारों की मांग है कि उन्हें ऐसी जगह बसाया जाए जहां रोजगार, स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं और सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध हों। उनके मुताबिक, पुरानी बस्ती से दूर जाने का मतलब सिर्फ घर बदलना नहीं, बल्कि रोजी-रोटी और सामाजिक रिश्तों से भी दूर हो जाना है।
प्रधानमंत्री आवास की सुरक्षा के नाम पर बेदखली?
स्थानीय निवासियों ने आरोप लगाया कि उन्हें हटाने के लिए सुरक्षा का हवाला दिया गया। उनका कहना है कि वे प्रधानमंत्री आवास के आसपास लंबे समय से रह रहे थे और अब अचानक उनके जीवन की पूरी व्यवस्था बदल गई है।
एक निवासी ने दावा किया कि उनका परिवार 1941 से इस इलाके में रह रहा है और परिवार के कई सदस्यों ने यहां सेवा की है। अन्य निवासियों ने भी कई दशकों से यहां रहने की बात कही।
हालांकि, सुरक्षा संबंधी दावों और बेदखली के आधिकारिक आधार को समझने के लिए प्रशासन के आदेशों, अदालत के निर्देशों और पुनर्वास नीति की पूरी जानकारी जरूरी है। केवल स्थानीय लोगों के आरोपों के आधार पर कार्रवाई के उद्देश्य या उसकी वैधता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
मीडिया की पहुंच पर भी सवाल
परिसर के गेट पर ताला लगा था और सुरक्षा कर्मियों ने मीडिया को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं दी। स्थानीय लोगों ने भी कहा कि उन्हें अपने पुराने घरों को देखने तक नहीं दिया जा रहा है।
प्रभावित परिवारों के लिए यह स्थिति भावनात्मक रूप से बेहद कठिन है। जिन घरों में उन्होंने वर्षों बिताए, वहां लौटकर अपना सामान या घर का बचा हुआ हिस्सा देख पाने की इच्छा भी पूरी नहीं हो पा रही है।
इस मामले में प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि परिसर में प्रवेश पर प्रतिबंध किस आदेश के तहत लगाया गया है, मीडिया की पहुंच क्यों रोकी जा रही है और प्रभावित परिवारों को अपने सामान तथा दस्तावेजों तक पहुंच कैसे मिलेगी।
प्रशासन से जवाब मांगते हैं ये सवाल
रेस कोर्स इलाके की कार्रवाई कई अहम सवाल छोड़ती है:
- मस्जिद की कानूनी स्थिति और उसके कथित वक्फ तथा विरासत दर्जे पर प्रशासन का स्पष्ट पक्ष क्या है?
- पानी और बिजली की आपूर्ति किस आदेश के तहत काटी गई और उन्हें बहाल करने की समयसीमा क्या है?
- दुर्गा मंदिर की स्थिति क्या है और क्या उसके संबंध में कोई कार्रवाई प्रस्तावित है?
- कितने परिवारों और घरों पर कार्रवाई हुई, और कितने परिवार पुनर्वास के लिए पात्र पाए गए?
- सावदा-घेवरा में प्रभावित परिवारों को रोजगार, स्कूल, अस्पताल और परिवहन की सुविधाएं किस स्तर पर उपलब्ध हैं?
- परिवारों को अपने पुराने घरों और सामान तक पहुंचने की अनुमति क्यों नहीं दी जा रही है?
घरों के मलबे से आगे भी है यह कहानी
रेस कोर्स की यह ग्राउंड रिपोर्ट उन परिवारों की कहानी सामने लाती है जिनके लिए बेदखली के बाद सबसे बड़ी चुनौती जीवन को दोबारा शुरू करना है। बच्चों की शिक्षा, महिलाओं का रोजगार, बुजुर्गों का इलाज और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा—ये सभी मुद्दे प्रशासनिक निर्णयों के मानवीय प्रभाव से जुड़े हैं।
मस्जिद और मंदिर के भविष्य को लेकर स्थानीय लोगों की आशंकाओं के बीच जरूरी है कि प्रशासन स्थिति स्पष्ट करे और हर संबंधित पक्ष को कानूनी प्रक्रिया के तहत अपनी बात रखने का अवसर मिले।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने घर हटाए गए। सवाल यह भी है कि जिन लोगों का जीवन इन घरों से जुड़ा था, उनके पुनर्वास, अधिकारों और बुनियादी जरूरतों की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
