September 29, 2026 4:17 pm
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देश में हर जगह मस्जिदें ढहाने की इतनी आतुरता क्यों भाजपा सरकारों में!

उज्जैन की शाही मस्जिद के हिस्से को सड़क चौड़ीकरण के लिए हटाने पर विवाद, पुलिस कार्रवाई और हाई कोर्ट के फैसले के बीच उठे कानून व भरोसे के सवाल।

उज्जैन की शाही मस्जिद: सड़क चौड़ीकरण, बुलडोजर और भरोसे का संकट

सवाल सिर्फ उज्जैन की शाही मस्जिद का नहीं है। सवाल यह है कि विकास, अतिक्रमण और धार्मिक स्थलों के बीच राज्य की कार्रवाई को लेकर देश में भरोसा इतना कमजोर क्यों हो गया है?

उज्जैन की शाही मस्जिद का एक हिस्सा सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई के दायरे में आया और इसके बाद जिस तरह तनाव पैदा हुआ, उसने एक स्थानीय प्रशासनिक विवाद को कहीं बड़े सवाल में बदल दिया है। 28 सितंबर 2026 को मस्जिद के बाहर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई, पथराव और आंसू गैस की कार्रवाई हुई और अगले दिन पुलिस ने 15 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी दी।

प्रशासन का पक्ष स्पष्ट है: यह कार्रवाई उज्जैन में सिंहस्थ 2028 से पहले चल रहे सड़क चौड़ीकरण और बुनियादी ढांचे के विस्तार का हिस्सा है। प्रस्तावित सड़क को 15 मीटर तक चौड़ा किया जाना है और शाही मस्जिद का वही हिस्सा हटाया जा रहा है जो प्रस्तावित सड़क की सीमा में आता है।

लेकिन कानून का पालन हो रहा है या नहीं, यह सवाल और उस कार्रवाई पर सामाजिक भरोसा—दो अलग प्रश्न हैं।

600 साल पुरानी मस्जिद का दावा और दस्तावेजों का सवाल

शाही मस्जिद के इमाम और प्रबंधन की ओर से दावा किया गया है कि मस्जिद का इतिहास 1390 तक जाता है और वह करीब 636 साल पुरानी है। मस्जिद पक्ष ने पुराने दस्तावेजों का हवाला भी दिया है।

लेकिन यहां इतिहास और वर्तमान विवाद को अलग-अलग देखना जरूरी है।

मौजूदा विवाद में जिन दस्तावेजों का उल्लेख हुआ है, उनमें 17 मार्च 1925 का एक दस्तावेज और 1985 का मध्य प्रदेश सरकार का राजपत्र शामिल हैं। ये रिकॉर्ड यह दिखाते हैं कि मस्जिद 1925 में मौजूद थी और बाद में भी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज थी। लेकिन इन दस्तावेजों के आधार पर अकेले यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वर्तमान संरचना निश्चित रूप से 1390 में ही बनी थी।

इसलिए “636 साल पुरानी मस्जिद” को निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य की तरह लिखना पत्रकारिता की दृष्टि से सावधानी के खिलाफ होगा। सही भाषा होगी—“मस्जिद प्रबंधन इसे 1390 का और करीब 636 साल पुराना बताता है।”

असल विवाद सड़क का है—लेकिन विवाद सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं

उज्जैन नगर निगम की योजना के मुताबिक सड़क को चौड़ा करना सिंहस्थ 2028 की तैयारियों का हिस्सा है। हाई कोर्ट के सामने नगर निगम ने यह भी कहा कि सड़क के इसी हिस्से में अन्य धार्मिक और गैर-धार्मिक निर्माणों पर भी कार्रवाई की गई है।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 9 सितंबर को शाही मस्जिद के हिस्से को हटाने के खिलाफ दायर याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत के समक्ष प्रशासन की ओर से यह तर्क रखा गया कि सड़क चौड़ीकरण में केवल मस्जिद ही प्रभावित नहीं हो रही और दूसरी धार्मिक संरचनाओं के हिस्से भी हटाए गए हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, अदालत के रिकॉर्ड में इसी सड़क पर 10 मंदिरों और एक मस्जिद के हिस्सों को हटाए जाने तथा शहर में करीब 80 धार्मिक स्थलों से जुड़े निर्माणों पर कार्रवाई का उल्लेख है।

इस तथ्य का महत्व है। क्योंकि विवाद को सिर्फ “मस्जिद बनाम सड़क” कह देना पूरे मामले को बहुत सरल बना देता है।

लेकिन इसके उलट यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जिस धार्मिक स्थल पर कार्रवाई हो रही है, उसके प्रबंधन और स्थानीय समुदाय को प्रक्रिया पर भरोसा हो। उज्जैन में बड़ी संख्या में लोगों का मस्जिद परिसर में रातभर जमा होना और बाद में पुलिस से टकराव यह दिखाता है कि प्रशासनिक आदेश और सामाजिक स्वीकार्यता के बीच गंभीर दूरी पैदा हो चुकी थी।

क्या यह “बुलडोजर मॉडल” का विस्तार है?

यही वह सवाल है जिसे उज्जैन की घटना राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाती है।

पिछले कुछ वर्षों में “बुलडोजर कार्रवाई” भारत की राजनीति और सार्वजनिक बहस का हिस्सा रही है। नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उन मामलों पर विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए थे जिनमें सरकारी एजेंसियों द्वारा संपत्तियों को ध्वस्त करने पर सवाल उठे थे। अदालत ने स्पष्ट किया था कि केवल किसी व्यक्ति के आरोपी या दोषी होने के आधार पर उसकी संपत्ति को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के नहीं गिराया जा सकता। उसने नोटिस, जवाब का अवसर, सुनवाई और अन्य प्रक्रियात्मक सुरक्षा पर जोर दिया।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के वे दिशानिर्देश मुख्यतः दंडात्मक या मनमानी demolition के संदर्भ में थे। उन्होंने वैध सड़क चौड़ीकरण या सार्वजनिक भूमि से अनधिकृत निर्माण हटाने की कार्रवाई को सामान्य रूप से प्रतिबंधित नहीं किया।

इसलिए उज्जैन की कार्रवाई को सीधे-सीधे किसी “नए मस्जिद-विरोधी कानून” का परिणाम बताना उपलब्ध तथ्यों से साबित नहीं होता।

असल सवाल इससे अधिक बुनियादी है: क्या विकास परियोजनाओं में धार्मिक संरचनाओं से जुड़े मामलों में समान नियम, पारदर्शी प्रक्रिया और सभी पक्षों के लिए एक जैसा व्यवहार सुनिश्चित हो रहा है?

भरोसे का संकट क्यों पैदा हुआ?

उज्जैन की तस्वीर को समझने के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि “हाई कोर्ट ने अनुमति दे दी।”

कानूनी वैधता और सामाजिक भरोसा एक ही चीज नहीं हैं।

जब किसी धार्मिक स्थल के सामने भारी पुलिस बल तैनात होता है, लोग रातभर उसके भीतर बैठे रहते हैं, फिर पथराव और आंसू गैस की स्थिति पैदा होती है, तो यह बताता है कि संवाद की प्रक्रिया कहीं न कहीं विफल हुई है। 28 सितंबर की घटना में पुलिस ने पथराव के बाद आंसू गैस का इस्तेमाल किया और बाद में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई।

इसके बाद मस्जिद के प्रभावित हिस्से को समुदाय के कुछ सदस्यों द्वारा स्वयं हटाने की तस्वीरें सामने आईं। प्रशासन ने इसे समुदाय की सहमति और सहयोग के रूप में प्रस्तुत किया। दूसरी ओर, इस दृश्य को देखने वाले लोगों के लिए यह एक धार्मिक स्थल के टूटने की भावनात्मक तस्वीर भी थी।

यही इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण परत है।

मुख्यमंत्री का अपना घर भी आया दायरे में

सड़क चौड़ीकरण अभियान के समर्थन में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने उज्जैन में अपने पैतृक मकान के उस हिस्से को स्वयं हटाने की शुरुआत की जो प्रस्तावित सड़क की सीमा में आ रहा था।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, लगभग 730 मीटर के विकास कार्य में सड़क को 15 मीटर तक चौड़ा किया जाना है और 272 भवन इस परियोजना से प्रभावित हो रहे हैं। राज्य सरकार ने इसके लिए करीब 9.80 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।

सरकार के लिए यह तर्क महत्वपूर्ण है: यदि मुख्यमंत्री की पारिवारिक संपत्ति भी सड़क चौड़ीकरण से प्रभावित हो रही है, तो कार्रवाई को केवल मुस्लिम धार्मिक स्थल के खिलाफ अभियान के रूप में देखना अधूरा होगा।

लेकिन इससे दूसरा सवाल खत्म नहीं होता—क्या हर धार्मिक स्थल के मामले में विकल्पों की पूरी पड़ताल, प्रक्रिया की पारदर्शिता और संवाद समान रूप से हुआ?

यही वह प्रश्न है जिसका जवाब सार्वजनिक रिकॉर्ड में जितना स्पष्ट होगा, उतना ही विवाद कम होगा।

क्या उज्जैन में “मस्जिद फ्री” करने का अभियान चल रहा है?

उपलब्ध रिपोर्टों में उज्जैन की सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत बड़ी संख्या में संरचनाओं के प्रभावित होने की बात सामने आई है। कुछ रिपोर्टों में 272 संरचनाओं का आंकड़ा दिया गया है। हाई कोर्ट के रिकॉर्ड से भी पता चलता है कि प्रशासन ने अन्य धार्मिक संरचनाओं के हिस्सों पर कार्रवाई का तर्क दिया था।

यह भी सच है कि धार्मिक स्थल का मामला केवल जमीन के क्षेत्रफल या नक्शे की रेखा का मामला नहीं होता। धार्मिक स्मृति, समुदाय की भावनाएं और ऐतिहासिक पहचान उससे जुड़ी होती हैं। इसलिए ऐसे मामलों में प्रशासन से सामान्य अतिक्रमण हटाने से अधिक पारदर्शिता की अपेक्षा स्वाभाविक है।

और यहीं विपक्ष की भूमिका का सवाल उठता है

इस विवाद ने राजनीतिक विपक्ष की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। लोकतंत्र में विपक्ष का काम केवल चुनाव के समय दिखाई देना नहीं है। जब किसी संवेदनशील धार्मिक स्थल को लेकर तनाव पैदा हो, तब तथ्यों की स्वतंत्र जांच, प्रभावित पक्षों की बात सामने लाना और प्रशासन से जवाब मांगना उसकी लोकतांत्रिक भूमिका का हिस्सा है।

लेकिन राजनीतिक विरोध और तथ्य-जांच एक ही चीज नहीं हैं।

यदि विपक्ष यह आरोप लगाता है कि किसी धार्मिक समुदाय को चुनकर निशाना बनाया जा रहा है, तो उसे आंकड़ों और दस्तावेजों के साथ यह दिखाना होगा कि समान परिस्थितियों में दूसरे निर्माणों के साथ क्या व्यवहार हुआ। और यदि सरकार कहती है कि कार्रवाई पूरी तरह विकास और सड़क चौड़ीकरण के लिए है, तो उसे भी सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि कितने निर्माण प्रभावित हुए, कितने धार्मिक स्थल प्रभावित हुए, किन्हें मुआवजा या पुनर्वास मिला और किन विकल्पों पर विचार किया गया।

यानी सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि “मस्जिद क्यों टूटी?”

सवाल यह भी होना चाहिए:

किस नक्शे के आधार पर टूटी?

कितनी जमीन सड़क के लिए आवश्यक थी?

क्या वैकल्पिक alignment पर विचार हुआ?

कितने अन्य धार्मिक और गैर-धार्मिक निर्माण हटाए गए?

नोटिस और सुनवाई की पूरी प्रक्रिया क्या रही?

और क्या प्रभावित पक्ष को न्यायिक अपील का वास्तविक अवसर मिला?

इन सवालों के जवाब ही यह तय करने में मदद करेंगे कि यह सामान्य शहरी पुनर्विकास की कार्रवाई थी, प्रशासनिक प्रक्रिया की समस्या थी, या इससे आगे कोई भेदभाव का प्रश्न भी उठता है।

उज्जैन की तस्वीर: विकास बनाम विरासत नहीं, भरोसे की परीक्षा

सिंहस्थ 2028 के लिए उज्जैन में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का विस्तार होना है। इतने बड़े आयोजन के लिए सड़कें, यातायात और सार्वजनिक सुरक्षा की तैयारी आवश्यक है।

लेकिन किसी भी विकास परियोजना की सफलता केवल सड़क की चौड़ाई से नहीं मापी जाती।

वह इस बात से भी मापी जाती है कि उस विकास की कीमत कौन चुका रहा है, प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और प्रभावित लोगों को कितना भरोसा है कि कानून सभी के लिए समान है।

शाही मस्जिद का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां एक साथ कई सवाल मौजूद हैं—शहरी विकास, धार्मिक विरासत, अतिक्रमण, न्यायिक प्रक्रिया, प्रशासनिक शक्ति और सामुदायिक भरोसा।

और शायद सबसे बड़ा सवाल यही है:

क्या राज्य विकास कर सकता है बिना नागरिकों को यह महसूस कराए कि उनके धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों की सुरक्षा किसी राजनीतिक माहौल पर निर्भर है?

उज्जैन का जवाब केवल एक मस्जिद की दीवारों से नहीं मिलेगा। इसका जवाब दस्तावेजों, अदालत के रिकॉर्ड, प्रशासनिक आदेशों और उन सभी धार्मिक तथा गैर-धार्मिक संरचनाओं के साथ हुए व्यवहार को एक साथ देखने से मिलेगा जो इस सड़क चौड़ीकरण परियोजना की जद में आए हैं।

यही वह जांच है जो होनी चाहिए—नारे से नहीं, रिकॉर्ड से।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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