September 12, 2026 10:15 pm
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एकेडमिक फ्रीडम में भारत निचले स्तर पर

Academic Freedom Index 2026 में भारत का स्कोर 0.14, 1900 के बाद सबसे निचला स्तर। जानिए अकादमिक स्वतंत्रता कैसे मापी जाती है और भारत क्यों पिछड़ा।

अकादमिक स्वतंत्रता 1900 के बाद सबसे निचले स्तर पर, आपातकाल से भी नीचे

Academic Freedom Index 2026 में भारत का स्कोर 0.14; 179 देशों में निचले 10-20 प्रतिशत में जगह, 2015 के मुकाबले भारी गिरावट

भारत की अकादमिक और शोध स्वतंत्रता को लेकर एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। Academic Freedom Index (AFI) 2026 के मुताबिक 2025 में भारत का अकादमिक स्वतंत्रता स्कोर घटकर 0.14 रह गया। 0 से 1 के पैमाने पर तैयार इस सूचकांक में 1 का अर्थ उच्चतम अकादमिक स्वतंत्रता है। भारत का मौजूदा स्कोर 1900 के बाद का सबसे निचला स्तर है और 1975-77 के आपातकाल के वर्षों से भी नीचे दर्ज किया गया है।

यह सूचकांक V-Dem Institute, Friedrich-Alexander-Universität Erlangen-Nürnberg (FAU), Scholars at Risk Network और Global Public Policy Institute (GPPi) के सहयोग से तैयार किया जाता है। 2026 अपडेट में दुनिया भर में अकादमिक स्वतंत्रता के 2025 तक के आंकड़ों का आकलन किया गया है।

0.14 तक पहुंचा भारत का स्कोर

भारत का Academic Freedom Index स्कोर 2015 में करीब 0.41 था, जो 2025 में घटकर 0.14 रह गया। यानी एक दशक में इसमें लगभग 0.27 अंक की गिरावट आई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2013 में भारत का स्कोर 0.62 था, जो 2014 में 0.46 और 2015 में 0.41 तक पहुंच गया। इसके बाद गिरावट का सिलसिला लगातार जारी रहा।

वर्षभारत का AFI स्कोर
20130.62
20140.46
20150.41
20200.28
20210.26
20220.25
20230.16
20240.15
20250.14

इस गिरावट का अर्थ केवल विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में नीचे जाना नहीं है। Academic Freedom Index इस बात को मापने की कोशिश करता है कि किसी देश में विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और छात्रों को ज्ञान के निर्माण, शोध, शिक्षण और विचारों के स्वतंत्र आदान-प्रदान की कितनी वास्तविक स्वतंत्रता हासिल है।

अकादमिक स्वतंत्रता आखिर मापी कैसे जाती है?

Academic Freedom Index अकादमिक स्वतंत्रता को पांच प्रमुख आयामों के जरिए मापता है:

1. शोध और अध्यापन की स्वतंत्रता
क्या शिक्षक और शोधकर्ता बिना राजनीतिक या अन्य अनुचित हस्तक्षेप के अपने शोध और शिक्षण के विषय और तरीके तय कर सकते हैं?

2. अकादमिक विचारों के आदान-प्रदान और प्रसार की स्वतंत्रता
क्या शोधकर्ता अपने विचारों और शोध-नतीजों को स्वतंत्र रूप से साझा और प्रकाशित कर सकते हैं?

3. संस्थागत स्वायत्तता
क्या विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षा संस्थान अपने अकादमिक और प्रशासनिक निर्णय स्वतंत्र रूप से ले सकते हैं?

4. कैंपस की संस्थागत अखंडता
क्या विश्वविद्यालय परिसर बाहरी दबाव, डर या अनुचित हस्तक्षेप से मुक्त रह सकते हैं?

5. अकादमिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
क्या शिक्षक, शोधकर्ता और विद्यार्थी अकादमिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर अपनी बात स्वतंत्र रूप से रख सकते हैं?

V-Dem के मुताबिक ये पांच संकेतक 0 से 1 के पैमाने पर अकादमिक स्वतंत्रता का समग्र आकलन तैयार करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। सूचकांक में 2,300 से अधिक देश-विशेषज्ञों के आकलनों को शामिल किया गया है और इन्हें Bayesian measurement model के जरिए संयोजित किया जाता है।

2013 के बाद लगातार गिरावट

भारत के आंकड़ों में सबसे महत्वपूर्ण बात गिरावट की दिशा है। 2013 में भारत का स्कोर 0.62 था। 2015 में यह 0.41 और 2020 में 0.28 रह गया। 2023 में यह तेजी से गिरकर 0.16 और फिर 2025 में 0.14 पर पहुंच गया।

2026 के आकलन में भारत को दुनिया के 179 देशों और क्षेत्रों में निचले 10-20 प्रतिशत में रखा गया है। भारत से ऊपर पाकिस्तान, इराक, सूडान, सीरिया और यमन जैसे देश भी हैं। दूसरी ओर चेक गणराज्य सूचकांक में शीर्ष पर है, जिसके बाद एस्टोनिया, बेल्जियम, जमैका और स्लोवेनिया आते हैं।

आपातकाल से भी नीचे क्यों महत्वपूर्ण है यह तुलना?

भारत के लिए इस रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि 2025 का स्कोर 1975-77 के आपातकाल के दौर से भी नीचे बताया गया है। यह वह दौर था जब नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए थे और राजनीतिक विरोध तथा प्रेस की स्वतंत्रता पर गंभीर अंकुश लगा था।

हालांकि इस तुलना को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि Academic Freedom Index अकादमिक स्वतंत्रता को मापता है; यह लोकतंत्र या नागरिक स्वतंत्रताओं का समग्र सूचकांक नहीं है। इसलिए इसका स्कोर सीधे तौर पर यह नहीं बताता कि देश में लोकतंत्र की स्थिति कितनी खराब या अच्छी है। यह विशेष रूप से उच्च शिक्षा, शोध, शिक्षण और अकादमिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर केंद्रित है।

विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और राजनीतिक हस्तक्षेप का सवाल

रिपोर्ट के आंकड़े भारत में अकादमिक स्वतंत्रता के सभी पांच आयामों में गिरावट की ओर संकेत करते हैं। विशेष रूप से 2013-14 के बाद गिरावट का रुझान तेज दिखाई देता है। ThePrint की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में, शोध और अध्यापन की स्वतंत्रता को छोड़कर, बाकी सभी आयाम अपने ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर पर थे।

यही वह जगह है जहां विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि विश्वविद्यालयों को पाठ्यक्रम, शोध, नियुक्तियों, प्रशासन और अकादमिक विमर्श के मामलों में पर्याप्त स्वायत्तता नहीं मिलती, तो अकादमिक स्वतंत्रता केवल कागज पर मौजूद अधिकार बनकर रह सकती है।

V-Dem के 2026 अपडेट में भी institutional autonomy को अकादमिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बुनियादी तत्व बताया गया है और उसके आंकड़े संस्थागत स्वायत्तता तथा व्यक्तिगत स्तर की अकादमिक स्वतंत्रताओं के बीच मजबूत संबंध की ओर संकेत करते हैं।

इतिहास और विज्ञान पर बहस भी इसी संदर्भ में

भारत में पाठ्यक्रमों, इतिहास की व्याख्या, विज्ञान और शोध के विषयों को लेकर पिछले कुछ वर्षों में तीखी सार्वजनिक बहस हुई है। यह बहस केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि किसी पाठ्यक्रम में क्या पढ़ाया जाए, बल्कि इस बड़े सवाल से जुड़ती है कि किसे शोध का विषय चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए और किसी शोध के निष्कर्ष को चुनौती देने या उस पर बहस करने की कितनी गुंजाइश है।

किसी विशेष विचार, धार्मिक दावे या सांस्कृतिक मान्यता पर शोध होना अपने आप में अकादमिक स्वतंत्रता के खिलाफ नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या शोध के लिए समान वैज्ञानिक और अकादमिक कसौटियां लागू होती हैं? क्या शोधकर्ता अपने निष्कर्षों पर स्वतंत्र बहस कर सकते हैं? और क्या असहमति रखने वाले शिक्षक या विद्यार्थी बिना भय और दंड के अपनी बात रख सकते हैं?

यही अंतर अकादमिक स्वतंत्रता और किसी विचारधारा के प्रचार के बीच महत्वपूर्ण है।

कैंपस में असहमति की जगह कितनी बची है?

अकादमिक स्वतंत्रता का सवाल केवल प्रोफेसरों और शोधकर्ताओं तक सीमित नहीं है। विश्वविद्यालय किसी भी लोकतांत्रिक समाज में विचारों के प्रयोग और असहमति के महत्वपूर्ण स्थान होते हैं।

कैंपस में छात्रों की राजनीतिक या सामाजिक बहस, स्टडी सर्कल, सेमिनार, प्रदर्शन और वैकल्पिक विचारों के लिए जगह कितनी है—यह भी अकादमिक वातावरण की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।

जब किसी विश्वविद्यालय में विचारों की बहस के बजाय असहमति को अनुशासनात्मक कार्रवाई, निलंबन या आपराधिक मामलों के खतरे के साथ देखा जाने लगे, तो सवाल केवल छात्र राजनीति का नहीं रह जाता। यह विश्वविद्यालय के बौद्धिक वातावरण का सवाल बन जाता है।

यह सिर्फ भारत की कहानी नहीं है

अकादमिक स्वतंत्रता में गिरावट केवल भारत तक सीमित नहीं है। Academic Freedom Index के 2026 अपडेट के मुताबिक पिछले एक दशक में 50 देशों में अकादमिक स्वतंत्रता में गिरावट दर्ज की गई है, जबकि केवल नौ देशों में सुधार हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक व्यक्तिगत स्तर की अकादमिक स्वतंत्रताओं और कैंपस इंटीग्रिटी में गिरावट सबसे व्यापक रही है।

लेकिन भारत का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां गिरावट लंबे समय से जारी है और 2025 का स्कोर ऐतिहासिक रूप से सबसे नीचे पहुंच गया है।

सवाल सिर्फ रैंकिंग का नहीं, ज्ञान की स्वतंत्रता का है

Academic Freedom Index का आंकड़ा हमें किसी एक विश्वविद्यालय या किसी एक सरकार के बारे में फैसला सुनाने के लिए नहीं, बल्कि एक बड़े सवाल पर विचार करने के लिए मजबूर करता है।

क्या विश्वविद्यालय सत्ता से सवाल पूछने की अपनी क्षमता बचाए हुए हैं?

क्या शिक्षक बिना डर के पढ़ा सकते हैं? क्या शोधकर्ता असुविधाजनक सवालों पर शोध कर सकते हैं? क्या विद्यार्थी किसी स्थापित विचार को चुनौती दे सकते हैं? क्या विश्वविद्यालय प्रशासन राजनीतिक दबाव से स्वतंत्र निर्णय ले सकता है? और क्या कैंपस में असहमति को लोकतांत्रिक संवाद माना जाता है या अनुशासन का मुद्दा?

इन सवालों का जवाब किसी एक सूचकांक से नहीं मिलता। लेकिन भारत का 0.14 का स्कोर और 1900 के बाद का ऐतिहासिक निचला स्तर यह जरूर बताता है कि अकादमिक स्वतंत्रता पर गंभीर सार्वजनिक बहस की जरूरत है।

क्योंकि जिस समाज में सवाल पूछने, असहमति जताने और नए ज्ञान की खोज करने की स्वतंत्रता कमजोर होती है, वहां सिर्फ विश्वविद्यालय नहीं—पूरे समाज की बौद्धिक क्षमता प्रभावित होती है।

मुकुल सरल

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