September 11, 2026 6:27 pm
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रिटायर होते ही कॉरपोरेट बोर्डरूम में एंट्री

CAG, RBI और SEBI जैसे संवेदनशील पदों से रिटायर हुए अधिकारियों की Ambani-Adani समूहों से जुड़ी नियुक्तियों ने ‘रिवॉल्विंग डोर’ और conflict of interest पर सवाल खड़े किए हैं।

अंबानी-अडानी समूहों में पूर्व नौकरशाहों की एंट्री पर उठते सवाल

CAG, RBI, SEBI, वित्त और गृह जैसे संवेदनशील पदों पर काम कर चुके अधिकारियों का रिटायरमेंट के बाद बड़े कॉरपोरेट समूहों में पहुंचना नया नहीं है। लेकिन जब सरकारी नियमन और नीतियों से गहराई से जुड़े अधिकारी कुछ ही वर्षों में उन्हीं क्षेत्रों की बड़ी निजी कंपनियों के बोर्ड में दिखाई देते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह महज विशेषज्ञता की मांग है या ‘रिवॉल्विंग डोर’ का संकेत?

“आजकल देश में सब कोई अंबानी, अडानी, शरणम् गच्छामि…”

सोशल मीडिया और राजनीतिक बहसों में इस तरह की व्यंग्यात्मक टिप्पणियां तेजी से सुनाई दे रही हैं। सवाल केवल इस बात का नहीं है कि कोई रिटायर्ड नौकरशाह निजी कंपनी में नौकरी या बोर्ड पद क्यों स्वीकार करता है। बड़ा सवाल यह है कि सरकार में रहते हुए जिन अधिकारियों ने नीतियों, नियमन, वित्त, ऊर्जा, बंदरगाह, बैंकिंग या बाजार से जुड़े फैसलों को देखा, उनके रिटायरमेंट के बाद उन्हीं क्षेत्रों की बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों के साथ संबंधों के लिए पर्याप्त पारदर्शिता और ‘कूलिंग-ऑफ’ व्यवस्था है या नहीं।

राजीव महर्षि: CAG से Jio Financial Services के बोर्ड तक

पूर्व IAS अधिकारी राजीव महर्षि इसका एक प्रमुख उदाहरण हैं।

महर्षि भारत के 13वें Comptroller and Auditor General (CAG) रहे। इससे पहले वे Union Finance Secretary और Union Home Secretary जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी रह चुके थे। CAG के रूप में उनका कार्यकाल अगस्त 2020 में समाप्त हुआ।

इसके करीब तीन साल बाद, जुलाई 2023 में, उन्हें Reliance Industries से अलग होकर बनी Jio Financial Services Ltd. के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशक नियुक्त किया गया। Reliance की आधिकारिक फाइलिंग में उनकी नियुक्ति और उनके प्रशासनिक अनुभव का उल्लेख है।

Jio Financial Services की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट में भी महर्षि को Independent Director के रूप में दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार वे Audit Committee और अन्य बोर्ड समितियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।

यहां सवाल नियुक्ति की वैधता का नहीं है। सवाल यह है कि भारत के सर्वोच्च सरकारी ऑडिट संस्थान का नेतृत्व कर चुके अधिकारी की एक बड़े कारोबारी समूह से जुड़ी वित्तीय कंपनी के बोर्ड में नियुक्ति को जनता किस नजर से देखती है और क्या मौजूदा नियम ऐसे संभावित हित-संघर्ष को पर्याप्त रूप से संबोधित करते हैं?

MK Jain: RBI के डिप्टी गवर्नर से Reliance के सलाहकार

दूसरा मामला और भी हाल का है।

MK Jain जून 2023 में Reserve Bank of India के Deputy Governor पद से रिटायर हुए। मार्च 2025 में खबर आई कि वे Reliance Industries के Advisor के रूप में जुड़ने वाले हैं। रिपोर्टों के मुताबिक उनकी भूमिका Reliance के financial services business की रणनीति से संबंधित हो सकती है।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि RBI देश की बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था का प्रमुख नियामक है और Reliance समूह ने पिछले वर्षों में financial services में बड़े पैमाने पर विस्तार किया है।

इसलिए यहां भी बहस का मुद्दा यह नहीं होना चाहिए कि MK Jain की विशेषज्ञता उपयोगी है या नहीं। वह निश्चित रूप से एक अनुभवी बैंकिंग अधिकारी रहे हैं। असली सवाल है:

क्या किसी प्रमुख वित्तीय नियामक के शीर्ष पद पर काम करने के बाद निजी वित्तीय कारोबार से जुड़ने के लिए पर्याप्त दूरी और पारदर्शिता सुनिश्चित की जाती है?

अडानी समूह में भी पूर्व नौकरशाहों की मौजूदगी

यह पैटर्न केवल Reliance तक सीमित नहीं है।

2023 में Economic Times ने Prime Database के आंकड़ों के आधार पर लिखा था कि Nifty-50 की 26 कंपनियों ने रिटायर्ड नौकरशाहों को Independent Directors के रूप में नियुक्त किया था। इनमें Adani Enterprises और Adani Ports & SEZ भी शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार Adani Group की सूचीबद्ध कंपनियों में Adani Wilmar को छोड़कर बाकी कंपनियों के बोर्डों में भी पूर्व नौकरशाह मौजूद थे।

अडानी समूह से जुड़े पुराने बोर्ड रिकॉर्ड भी दिखाते हैं कि यह चलन नया नहीं है। उदाहरण के लिए, पूर्व IAS अधिकारी Gopal Krishna Pillai, जो भारत के पूर्व Home Secretary रहे हैं, Adani Ports के Independent and Non-Executive Director रहे हैं। कंपनी के आधिकारिक रिकॉर्ड में उन्हें “Retired IAS Officer” के रूप में दर्ज किया गया था।

इसी तरह, Adani Power के पुराने वार्षिक रिकॉर्ड में पूर्व IAS अधिकारी B. B. Tandon की Additional Director के रूप में नियुक्ति का उल्लेख मिलता है।

और Adani Group के NDTV अधिग्रहण के बाद कंपनी के बोर्ड में भी पूर्व नौकरशाहों की एंट्री हुई। पूर्व SEBI Chairman U. K. Sinha को मार्च 2023 में NDTV का Independent Director और Non-Executive Chairperson बनाया गया था। इसके बाद पूर्व Financial Services Secretary Dinesh Kumar Mittal भी NDTV के बोर्ड में शामिल हुए।

आखिर कंपनियां पूर्व नौकरशाहों को क्यों चाहती हैं?

यहां एक जरूरी बात समझना भी महत्वपूर्ण है। हर ऐसी नियुक्ति को “इनाम” या “सौदा” कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

पूर्व नौकरशाहों के पास वर्षों का प्रशासनिक अनुभव, नियामकीय समझ और जटिल सरकारी प्रक्रियाओं का ज्ञान होता है। यही कारण है कि कंपनियां उन्हें Independent Director, Advisor या Board Member के रूप में नियुक्त करती हैं।

लेकिन कॉरपोरेट गवर्नेंस पर चर्चा करने वाले विशेषज्ञों ने इसके दूसरे पहलू की ओर भी ध्यान दिलाया है।

Economic Times की रिपोर्ट के अनुसार, शोध और Prime Database के आंकड़ों से यह संकेत मिला कि regulated industries में कंपनियां पूर्व नौकरशाहों को अपेक्षाकृत अधिक नियुक्त करती हैं। रिपोर्ट में इसे कंपनियों की “influence capital” और government networks से जुड़ने की क्षमता से भी जोड़ा गया।

यानी एक पूर्व अधिकारी की कीमत केवल उसके तकनीकी ज्ञान की वजह से नहीं, बल्कि उसकी सरकारी व्यवस्था की समझ, संपर्कों और संस्थागत अनुभव की वजह से भी हो सकती है।

‘रिवॉल्विंग डोर’ का सवाल

दुनिया भर में इस स्थिति को revolving door कहा जाता है—जब कोई व्यक्ति सरकार और निजी क्षेत्र के बीच बार-बार आता-जाता है।

यह अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब:

  • नियामक संस्था का वरिष्ठ अधिकारी रिटायर होने के तुरंत बाद उसी क्षेत्र की कंपनी से जुड़ जाए;
  • अधिकारी के कार्यकाल के दौरान लिए गए फैसलों और बाद की कॉरपोरेट नियुक्ति के बीच संभावित हित-संघर्ष हो;
  • जनता को यह स्पष्ट न हो कि नियुक्ति किन मानदंडों पर हुई;
  • या कूलिंग-ऑफ नियम इतने कमजोर हों कि वास्तविक स्वतंत्रता पर सवाल उठने लगें।

भारत में भी इस विषय पर लंबे समय से बहस होती रही है। पूर्व नौकरशाहों को निजी कंपनियों के बोर्ड में नियुक्त किए जाने पर ThePrint ने भी वर्षों पहले रिपोर्ट करते हुए इसे “Lutyens’ Delhi” और कॉरपोरेट बोर्डरूम के बीच बढ़ती आवाजाही के संदर्भ में देखा था।

सवाल नियुक्ति पर नहीं, व्यवस्था पर है

इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “रिटायर्ड अधिकारी निजी कंपनी में क्यों गया?”

सवाल इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है:

क्या भारत की मौजूदा व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि सरकारी पद पर रहते हुए लिए गए फैसले भविष्य में किसी निजी कंपनी के साथ आर्थिक संबंधों से प्रभावित न हों?

क्या संवेदनशील नियामकीय पदों के लिए पर्याप्त cooling-off period होना चाहिए?

क्या रिटायरमेंट के बाद किसी कंपनी में नियुक्ति की स्थिति में पूर्व अधिकारी को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि अपने सरकारी कार्यकाल में उसने उस कंपनी या उसके क्षेत्र से जुड़े कौन-कौन से निर्णय लिए थे?

क्या Independent Director की भूमिका वास्तव में स्वतंत्र है, या उसका सरकारी अनुभव ही कंपनी के लिए सबसे बड़ी ‘योग्यता’ बन जाता है?

और सबसे अहम—क्या नियम सभी के लिए समान हैं?

‘इनाम’ कहना जल्दबाजी, सवाल पूछना जरूरी

राजीव महर्षि, MK Jain, U. K. Sinha या दूसरे पूर्व अधिकारियों की नियुक्तियों को बिना प्रमाण “रिटायरमेंट का इनाम” कहना उचित नहीं होगा।

लेकिन इन नियुक्तियों को केवल “अनुभव का सम्मान” कहकर सवालों से बचना भी ठीक नहीं है।

जब एक ओर सरकार और कॉरपोरेट क्षेत्र के बीच नियमन, जमीन, ऊर्जा, वित्त, बंदरगाह, बैंकिंग, बाजार और मीडिया जैसे क्षेत्रों में गहरे संबंध हों, तब पूर्व नियामकों और वरिष्ठ नौकरशाहों की निजी क्षेत्र में नियुक्तियों की पारदर्शिता सार्वजनिक हित का विषय बन जाती है।

इसलिए असली सवाल शायद यह नहीं है कि—

“रिटायरमेंट के बाद ये अधिकारी कहां गए?”

बल्कि यह है कि—

“सरकारी कुर्सी और कॉरपोरेट बोर्डरूम के बीच कितनी दूरी होनी चाहिए?”

और अगर वह दूरी बहुत कम है, तो क्या भारत को अपने cooling-off और conflict-of-interest नियमों पर दोबारा विचार करने की जरूरत है?

यही वह सवाल है जिसे अब केवल सोशल मीडिया पर नहीं, बल्कि संसद, नियामक संस्थाओं और कॉरपोरेट गवर्नेंस की बहस में भी गंभीरता से पूछा जाना चाहिए।

मुकुल सरल

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