3 हजार रुपये के लिए नंगे पैर दौड़ीं रमा बाई, यह विकास की एक कड़वी तस्वीर है
महाराष्ट्र के बीड की 47 वर्षीय रमा बाई ने 31 अगस्त को हुई मैराथन में नंगे पैर दौड़कर पहला स्थान हासिल किया और 3 हजार रुपये का पुरस्कार जीता। उनकी बेटी ने भी दौड़ में दूसरा स्थान हासिल कर 2 हजार रुपये जीते। मीडिया में यह कहानी मां के साहस और ममता की मिसाल के तौर पर सामने आई, लेकिन रमा बाई की कहानी का एक दूसरा पहलू भी है—क्या 2026 के भारत में एक गरीब मां को अपनी बेटियों की पढ़ाई के लिए 3 हजार रुपये जुटाने के लिए मैराथन दौड़ने को मजबूर होना विकास की कहानी का हिस्सा नहीं है?
महाराष्ट्र के बीड की 47 वर्षीय रमा बाई की तस्वीर और उनकी कहानी इन दिनों चर्चा में है। कमर में साड़ी का फेटा बांधकर और नंगे पैर मैराथन में दौड़ती रमा बाई ने पहला स्थान हासिल किया। उन्हें पुरस्कार के तौर पर 3 हजार रुपये मिले। उनकी बेटी ने भी इस दौड़ में हिस्सा लिया और दूसरा स्थान हासिल करते हुए 2 हजार रुपये जीते।
कुल 5 हजार रुपये की यह रकम रमा बाई और उनकी बेटी के लिए महज पुरस्कार राशि नहीं थी। यह उनकी पढ़ाई जारी रखने के लिए जरूरी पैसा था।
जब 3 हजार रुपये के लिए लगानी पड़ी पूरी ताकत
रमा बाई के मुताबिक, वह एक जगह खाना बनाने का काम करती हैं। लेकिन उस काम से होने वाली आमदनी से अपनी दोनों बेटियों को अच्छी शिक्षा देना मुश्किल था। ऐसे में मां और बेटी ने तय किया कि मैराथन में हिस्सा लेकर पुरस्कार जीतने की कोशिश की जाए।
रमा बाई ने दौड़ में अपनी पूरी ताकत लगा दी। रास्ते में उनके पैर में कांटा भी चुभ गया। पसीने और थकान के बीच एक समय उन्हें लगा कि शायद वह दौड़ पूरी नहीं कर पाएंगी। लेकिन फिर उन्हें याद आया कि जीत की 3 हजार रुपये की रकम उनके लिए कितनी जरूरी है।
यही सोच उन्हें आगे बढ़ाती रही और वह पहले स्थान पर पहुंचीं।
बेटी दूसरे स्थान पर आई और उसे 2 हजार रुपये मिले। इस तरह मां-बेटी ने मिलकर 5 हजार रुपये जीते। इन पैसों से बेटी अपनी पढ़ाई के लिए किताबें और पेन खरीद सकेगी।
मीडिया की कहानी में ‘मां की ममता’, लेकिन सवाल कुछ और भी है
रमा बाई की कहानी को मां के साहस, ममता और बेटियों को पढ़ाने के संकल्प की कहानी के रूप में देखना स्वाभाविक है। इसमें कोई शक नहीं कि जिस तरह उन्होंने कठिन परिस्थितियों में दौड़ लगाई, वह प्रेरणादायक है।
लेकिन क्या कहानी यहीं खत्म हो जाती है?
जब एक 47 साल की महिला, जो पहले से ही घरेलू और मेहनत-मजदूरी के काम से अपने परिवार को चलाने की कोशिश कर रही है, अपनी बेटी की किताब-कॉपी के लिए 3 हजार रुपये जीतने के मकसद से मैराथन दौड़ती है, तो यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि उसके सामने आर्थिक विकल्प कितने हैं।
रमा बाई का साहस अपनी जगह है, लेकिन उनकी मजबूरी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
7.8 फीसदी GDP और रमा बाई की दौड़
यह तस्वीर ऐसे समय सामने आई है जब देश की आर्थिक प्रगति और GDP के आंकड़ों को लेकर सरकार और उसके समर्थकों की ओर से विकास की बड़ी तस्वीर पेश की जा रही है।
GDP के बढ़ने को आर्थिक उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा सकता है। लेकिन विकास का असली अर्थ तब सामने आता है जब हम यह देखें कि समाज के सबसे गरीब तबके के लोगों की जिंदगी कितनी बदली है।
रमा बाई की कहानी इसी विरोधाभास को सामने रखती है।
एक तरफ देश की अर्थव्यवस्था की तेज वृद्धि के आंकड़े हैं, दूसरी तरफ एक गरीब मां है जिसे अपनी बेटियों की शिक्षा के लिए 3 हजार रुपये जुटाने के लिए मैराथन में अपनी पूरी ताकत झोंकनी पड़ती है।
सवाल यह नहीं है कि रमा बाई ने दौड़कर जीत हासिल क्यों की। सवाल यह है कि उन्हें अपनी बेटी की किताबों और पेन के लिए इस तरह के जोखिम और शारीरिक मेहनत पर निर्भर क्यों होना पड़ा?
बेटी की पढ़ाई के लिए मां की दौड़
रमा बाई की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद यही है कि उन्होंने अपनी बेटियों की पढ़ाई को प्राथमिकता दी।
वह खुद खाना बनाने का काम करती हैं। आमदनी सीमित है। इसके बावजूद वह चाहती हैं कि उनकी दोनों बेटियां अच्छी शिक्षा हासिल करें और उनका भविष्य बेहतर हो।
इसी उम्मीद ने उन्हें मैराथन में उतारा।
दौड़ के दौरान पैर में कांटा चुभने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ एक दौड़ नहीं थी। इसके पीछे बेटी की पढ़ाई, किताबें और आगे बढ़ने की उम्मीद थी।
यही वजह है कि रमा बाई की तस्वीर को केवल ‘मां की ममता’ कहकर खत्म कर देना उनकी कहानी के एक बड़े हिस्से को अनदेखा करना होगा।
यह कहानी रमा बाई की है, लेकिन सवाल पूरे देश से है
रमा बाई ने मैराथन जीत ली। उन्होंने अपनी बेटी के लिए 3 हजार रुपये जुटा लिए। उनकी बेटी ने भी 2 हजार रुपये जीते।
लेकिन क्या किसी देश की सफलता को इस बात से भी नहीं मापा जाना चाहिए कि उसकी गरीब माताओं को अपनी बेटियों की शिक्षा के लिए इस तरह की जद्दोजहद कितनी करनी पड़ती है?
रमा बाई की जीत निश्चित रूप से सम्मान और प्रशंसा की हकदार है। लेकिन उनकी मजबूरी पर सवाल उठाना भी उतना ही जरूरी है।
क्योंकि अगर विकास का मतलब सिर्फ GDP के आंकड़े हैं, तो रमा बाई की दौड़ उस विकास की तस्वीर का दूसरा हिस्सा दिखाती है—जहां एक मां अपनी बेटी की किताबों के लिए नंगे पैर दौड़ रही है।
रमा बाई जीतीं जरूर हैं, लेकिन उनकी यह जीत हमसे एक बड़ा सवाल भी पूछती है: क्या ऐसा भारत, जहां गरीब मां को बेटी की पढ़ाई के लिए 3 हजार रुपये जुटाने को मैराथन दौड़नी पड़े, वही विकास का भारत है जिसकी तस्वीर हमें दिखाई जा रही है?
