September 2, 2026 12:50 am
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भागवत को US जाकर याद आया हिंदू-मुस्लिम प्रेम

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिका में कहा कि भारत में मुसलमानों को न चाहने वाला हिंदू नहीं है। उनके बयान के बीच भारत में मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा और RSS से जुड़े संगठनों पर उठ रहे सवालों की पड़ताल।

लेकिन भारत में lynching पर चुप रहने पर उठे गंभीर सवाल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने अमेरिका के न्यूयॉर्क में भारत में मुस्लिमों की मौजूदगी और हिंदू विचारधारा को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने एक बार फिर संघ की विचारधारा और उसके भारत में जमीनी प्रभाव को लेकर बहस तेज कर दी है।

29 अगस्त को न्यूयॉर्क में आयोजित ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ कार्यक्रम में मोहन भागवत ने कहा कि अगर कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा। उन्होंने कहा कि अलग-अलग धर्मों के रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है और हर इंसान की गरिमा समान है।

भागवत ने यह भी कहा कि विविधता को स्वीकार करना और उसकी रक्षा करना जरूरी है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका में उनकी यात्रा को लेकर मानवाधिकार संगठनों और कुछ राजनीतिक समूहों ने RSS की विचारधारा और भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर सवाल उठाए हैं।

लेकिन सवाल यह है कि अमेरिका की धरती पर दिया गया यह संदेश भारत में RSS और उससे जुड़े संगठनों की गतिविधियों पर भी लागू होगा या नहीं?

अमेरिका में समावेशिता की बात, भारत में हिंसा पर खामोशी क्यों?

भागवत के बयान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि भारत में मुसलमानों को बाहर करने की सोच हिंदू विचारधारा के अनुरूप नहीं है। यह बात अपने आप में स्पष्ट और महत्वपूर्ण है।

लेकिन आलोचकों का सवाल है कि यदि RSS प्रमुख वास्तव में भारत को ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जिसमें मुसलमान बराबरी के साथ रहें, तो भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ होने वाली हिंसा, नफरत और भीड़ की राजनीति पर संघ की आवाज कितनी स्पष्ट रही है?

यही वह विरोधाभास है जिसे लेकर अब सवाल उठ रहे हैं।

दक्षिण एशिया जस्टिस कैंपेन (SAJC) के India Persecution Tracker के अनुसार, 2026 के पहले सात महीनों में भारत में कम से कम 44 मुस्लिमों की मौत दर्ज की गई। रिपोर्ट में इनमें 19 मौतों को राज्य से जुड़े मामलों और 25 को हिंदू चरमपंथी गैर-राज्य तत्वों से जुड़ी हिंसा के रूप में वर्गीकृत किया गया है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि ये आंकड़े केवल उसके द्वारा दर्ज और सत्यापित मामलों पर आधारित हैं और संपूर्ण तस्वीर नहीं माने जा सकते।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इन 25 मौतों को सीधे RSS या उसके किसी एक संगठन से जोड़ना उचित नहीं होगा। ट्रैकर इन्हें व्यापक रूप से हिंदू चरमपंथी गैर-राज्य तत्वों से जोड़ता है। इसलिए किसी विशिष्ट संगठन की जिम्मेदारी का दावा अलग-अलग मामलों के उपलब्ध पुलिस और न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

फिर भी, यही आंकड़े यह सवाल जरूर खड़ा करते हैं कि RSS और उसके नेतृत्व की सार्वजनिक प्रतिक्रिया ऐसी घटनाओं पर कितनी स्पष्ट और लगातार रही है?

बजरंग दल और दूसरे संगठनों को लेकर सवाल

RSS का व्यापक संगठनात्मक परिवार कई अलग-अलग संगठनों से मिलकर बना है। बजरंग दल विश्व हिंदू परिषद (VHP) से जुड़ा संगठन है, जबकि RSS स्वयं एक अलग संगठन है। इसलिए किसी भी हिंसक घटना के लिए पूरे RSS को सीधे जिम्मेदार ठहराना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

लेकिन आलोचकों का तर्क इससे अलग है।

उनका कहना है कि जब संघ प्रमुख अमेरिका में यह संदेश देते हैं कि मुसलमान भारत का अभिन्न हिस्सा हैं और उन्हें बाहर करने की सोच हिंदू विचारधारा के खिलाफ है, तो यही संदेश भारत में भी उतनी ही स्पष्टता से सुनाई देना चाहिए—खासकर उन घटनाओं के समय जब मुस्लिम समुदाय के खिलाफ हिंसा या नफरत के आरोप सामने आते हैं।

यही वजह है कि सवाल उठता है:

क्या RSS नेतृत्व ने अपने प्रभाव क्षेत्र और उससे जुड़े संगठनों को कभी उतनी ही स्पष्ट भाषा में यह निर्देश दिया है कि किसी भी मुस्लिम नागरिक के खिलाफ धार्मिक पहचान के आधार पर हिंसा स्वीकार्य नहीं है?

अगर ऐसा संदेश दिया गया है, तो क्या उसे सार्वजनिक रूप से और लगातार दोहराया गया है?

सवाल सिर्फ मोहन भागवत से नहीं, ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा से भी

मोहन भागवत के बयान का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा है।

भारत का संविधान देश के सभी नागरिकों को समान नागरिक अधिकार देता है। ऐसे में किसी नागरिक की देश में मौजूदगी को उसके धर्म के आधार पर तय करने का अधिकार किसी धार्मिक या सामाजिक संगठन के पास नहीं है।

इसलिए बहस सिर्फ इस बात पर नहीं है कि मोहन भागवत ने अमेरिका में क्या कहा।

असल सवाल यह है कि ‘हिंदू राष्ट्र’ की RSS की अवधारणा में मुस्लिम, ईसाई, सिख और दूसरे धार्मिक समुदायों की संवैधानिक नागरिकता का स्थान क्या है?

भागवत का न्यूयॉर्क बयान इस सवाल का एक उत्तर देने की कोशिश जरूर करता दिखाई देता है। लेकिन आलोचकों के लिए अगला सवाल इससे भी बड़ा है—क्या यही विचार भारत में संघ परिवार से जुड़े संगठनों की राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी दिखाई देता है?

‘माइंड योर बिजनेस’ नहीं, संविधान का सवाल

भारत में कौन रहेगा और कौन नहीं रहेगा, यह फैसला किसी संगठन या नेता के बयान से नहीं हो सकता। भारत का संविधान नागरिकता, समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का ढांचा तय करता है।

इसलिए मोहन भागवत का अमेरिका में दिया गया यह संदेश तभी ज्यादा विश्वसनीय माना जाएगा जब भारत में भी मुस्लिम नागरिकों के खिलाफ होने वाली हिंसा, धमकी और भेदभाव के मामलों में संघ नेतृत्व की आवाज उतनी ही स्पष्ट हो।

एक तरफ यह कहना कि ‘भारत में मुसलमानों के लिए जगह नहीं होने की बात करने वाला हिंदू नहीं है’, और दूसरी तरफ मुस्लिमों के खिलाफ होने वाली हिंसा पर कथित चुप्पी—यही वह विरोधाभास है जिसे लेकर बहस हो रही है।

अमेरिका में दिया गया भाषण सिर्फ एक भाषण नहीं है। यह RSS की वैश्विक छवि और उसकी भारत में भूमिका के बीच मौजूद अंतर पर भी सवाल खड़ा करता है।

अब असली परीक्षा यह है कि मोहन भागवत का यह संदेश भारत में भी उतनी ही ताकत से सुनाई देता है या नहीं—खासकर तब, जब किसी मुस्लिम नागरिक को उसकी पहचान की वजह से निशाना बनाया जाता है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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