August 25, 2026 2:26 am
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8.7 करोड़ युवा NEET: न पढ़ाई, न नौकरी, न ट्रेनिंग

NITI Aayog की 2026 रिपोर्ट के मुताबिक 15-29 वर्ष के करीब 8.7 करोड़ युवा NEET श्रेणी में हैं। जानिए युवा बेरोजगारी, स्किलिंग और शिक्षा संकट की पूरी तस्वीर।

NITI Aayog की रिपोर्ट ने खोली युवाओं के भविष्य की तस्वीर

भारत को दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में गिना जाता है और युवाओं को देश के भविष्य की ताकत बताया जाता है। लेकिन इसी युवा आबादी के एक बड़े हिस्से के सामने शिक्षा, रोजगार और कौशल प्रशिक्षण—तीनों से दूर होने का संकट खड़ा है। यह दावा किसी विपक्षी दल या राजनीतिक संगठन की रिपोर्ट का नहीं, बल्कि नीति आयोग (NITI Aayog) की हालिया रिपोर्ट का है।

नीति आयोग की अगस्त 2026 में जारी ‘Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047’ रिपोर्ट के मुताबिक, 15 से 29 वर्ष की उम्र के करीब 8.7 करोड़ युवा NEET श्रेणी में हैं। NEET यानी ऐसे युवा जो न तो शिक्षा में हैं, न रोजगार में और न ही किसी तरह की ट्रेनिंग ले रहे हैं।

8.7 करोड़ युवाओं के सामने क्या संकट है?

रिपोर्ट के मुताबिक 2024 की अनुमानित आबादी के आधार पर 15-29 वर्ष आयु वर्ग में लगभग 8.7 करोड़ युवा NEET श्रेणी में आते हैं। यह आंकड़ा युवाओं के लिए केवल बेरोजगारी का सवाल नहीं उठाता, बल्कि शिक्षा से रोजगार तक पहुंचने वाली पूरी व्यवस्था की चुनौतियों को सामने रखता है।

NEET युवा जरूरी नहीं कि सभी बेरोजगार हों। इस श्रेणी में वे युवा शामिल होते हैं जो न पढ़ाई कर रहे हैं, न रोजगार में हैं और न ही किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल हैं। इसलिए यह आंकड़ा युवाओं के श्रम बाजार से बाहर रहने और कौशल विकास के अवसरों की कमी को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

डिग्री है, लेकिन नौकरी अपनी योग्यता के मुताबिक नहीं

रिपोर्ट में भारत की उच्च शिक्षा और रोजगार व्यवस्था के बीच मौजूद बड़े अंतर की ओर भी इशारा किया गया है।

नीति आयोग ने आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 का हवाला देते हुए बताया है कि भारत में केवल 8.25 प्रतिशत स्नातक ही ऐसी नौकरियों में कार्यरत हैं जो उनकी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप हैं। यानी बड़ी संख्या में युवा डिग्री हासिल करने के बाद भी अपनी पढ़ाई से मेल खाने वाला काम नहीं पा रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सभी स्नातकों में बेरोजगारी दर करीब 13 प्रतिशत थी, जबकि स्नातक महिलाओं में यह दर 20.4 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। यह राष्ट्रीय बेरोजगारी दर 3.2 प्रतिशत से काफी अधिक थी।

इसका एक असर यह भी है कि कई युवा परिवार की आर्थिक जरूरतों के कारण अपनी योग्यता से कम वेतन वाली नौकरी स्वीकार कर लेते हैं। दूसरी ओर, कुछ युवा उचित अवसर नहीं मिलने के कारण रोजगार की मुख्यधारा से ही बाहर हो जाते हैं और NEET श्रेणी में पहुंच जाते हैं।

गरीब परिवारों के युवाओं के लिए स्किल ट्रेनिंग भी महंगी

नीति आयोग की रिपोर्ट केवल रोजगार की कमी की बात नहीं करती, बल्कि यह भी बताती है कि कौशल प्रशिक्षण तक पहुंच आर्थिक स्थिति से जुड़ी हुई है।

कम आय वाले परिवारों के छात्रों के लिए कॉलेज फीस और ट्यूशन का खर्च पहले ही बड़ी चुनौती है। इसके बाद अलग से रोजगार-केंद्रित या उद्योग से जुड़े स्किल कोर्स की फीस देना उनके लिए मुश्किल हो जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार एडवांस्ड और प्लेसमेंट-लिंक्ड ट्रेनिंग कार्यक्रम, जो बेहतर और स्थिर रोजगार तक पहुंच का रास्ता बन सकते हैं, अक्सर उन युवाओं की पहुंच से बाहर होते हैं जिन्हें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

BA, B.Com और B.Sc जैसी सामान्य स्नातक डिग्रियां भी अपने आप में नौकरी की गारंटी नहीं बन पा रही हैं। कई शुरुआती स्तर की नौकरियों में भी Tally, Office Applications या अन्य रोजगार-केंद्रित कौशल की जरूरत पड़ती है।

पढ़ाई में डिग्री, लेकिन रोजगार के लिए जरूरी कौशल की कमी

नीति आयोग ने शिक्षा व्यवस्था में एक और महत्वपूर्ण समस्या की ओर इशारा किया है—पढ़ाई और काम के बीच का अंतर।

रिपोर्ट के मुताबिक स्कूलों और उच्च शिक्षा संस्थानों में व्यावहारिक प्रशिक्षण, हैंड्स-ऑन प्रोजेक्ट और उद्योग से जुड़ाव अभी भी पर्याप्त नहीं है। इसका असर युवाओं की संचार क्षमता, डिजिटल कौशल, समस्या-समाधान और इंटरव्यू की तैयारी पर पड़ता है।

यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि युवा कितने पढ़े-लिखे हैं। सवाल यह भी है कि उनकी शिक्षा उन्हें रोजगार के लिए कितना तैयार करती है।

युवाओं और महिलाओं के लिए सस्ती ट्रेनिंग की जरूरत

नीति आयोग ने युवाओं और महिलाओं के लिए किफायती या सब्सिडी वाले प्रशिक्षण विकल्पों तथा विशेष वित्तीय सहायता की जरूरत बताई है।

महिलाओं के मामले में समस्या और जटिल हो जाती है। रिपोर्ट के अनुसार देखभाल की जिम्मेदारियां, सुरक्षित परिवहन, बच्चों की देखभाल की सुविधा और घर के करीब प्रशिक्षण केंद्रों की कमी उनकी आर्थिक भागीदारी को प्रभावित करती है।

इसलिए सिर्फ ट्रेनिंग सेंटर खोल देना पर्याप्त नहीं है। प्रशिक्षण को युवाओं और महिलाओं की वास्तविक सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप बनाना भी जरूरी है।

10 साल में 94 हजार सरकारी स्कूल कम हुए

युवाओं की शिक्षा और रोजगार के संकट को समझने के लिए स्कूल शिक्षा की स्थिति को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

नीति आयोग की एक अलग रिपोर्ट के अनुसार 2014-15 से 2024-25 के बीच भारत में सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख रह गई—यानी करीब 94 हजार सरकारी स्कूल कम हुए। औसतन यह संख्या लगभग 25 स्कूल प्रतिदिन के बराबर बैठती है।

हालांकि इस आंकड़े को सीधे-सीधे यह कहना कि इतने स्कूल केवल ‘बंद’ कर दिए गए, पूरी तस्वीर नहीं बताता। रिपोर्ट और उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक स्कूलों की संख्या में गिरावट के पीछे स्कूलों का विलय/कंसोलिडेशन, कम नामांकन और बदलती जनसांख्यिकी जैसे कारण भी हैं। इसी अवधि में निजी स्कूलों की संख्या बढ़ी है।

फिर भी यह सवाल महत्वपूर्ण है कि स्कूलों के विलय या दूरी बढ़ने का असर खासकर ग्रामीण और गरीब परिवारों के बच्चों की शिक्षा तक पहुंच पर कितना पड़ता है।

स्कूल से कॉलेज और कॉलेज से नौकरी तक टूटती कड़ी

कुल तस्वीर को जोड़कर देखें तो समस्या केवल बेरोजगारी की नहीं है।

एक तरफ बड़ी संख्या में युवा उच्च शिक्षा में प्रवेश करते हैं, लेकिन उनकी डिग्री का रोजगार से पर्याप्त जुड़ाव नहीं बन पाता। दूसरी तरफ महंगे स्किलिंग प्रोग्राम गरीब और निम्न-मध्यम आय वाले युवाओं की पहुंच से बाहर रहते हैं। और तीसरी तरफ बड़ी संख्या में युवा शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण—तीनों से बाहर हो जाते हैं।

यही वह जगह है जहां 8.7 करोड़ NEET युवाओं का आंकड़ा भारत के विकास मॉडल के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।

भारत के विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य तभी टिकाऊ हो सकता है जब युवाओं के पास सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और बाजार की जरूरत के मुताबिक कौशल हासिल करने के वास्तविक अवसर भी हों।

2047 के लक्ष्य के सामने युवाओं का सवाल

नीति आयोग की रिपोर्ट का फोकस भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए स्किलिंग व्यवस्था को बदलने पर है। लेकिन रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े यह बताते हैं कि चुनौती केवल भविष्य की तैयारी की नहीं है—मौजूदा पीढ़ी के करोड़ों युवाओं को शिक्षा से रोजगार तक जोड़ने की भी है।

इसलिए बहस केवल इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि भारत विश्वगुरु बनेगा या विकसित भारत बनेगा। असली सवाल यह है कि आज के युवा को पढ़ाई, ट्रेनिंग और सम्मानजनक रोजगार का रास्ता कब और कैसे मिलेगा?

अगर करोड़ों युवा शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से बाहर हैं, तो यह सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं है। यह सामाजिक और राजनीतिक सवाल भी है।

युवा भविष्य हैं—लेकिन भविष्य का निर्माण नारों से नहीं, शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसरों से होता है।

मुकुल सरल

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