राहुल गांधी मानहानि केस: Godse-RSS कनेक्शन पर फिर सवाल, BJP-RSS के सामने नई चुनौती
पुणे कोर्ट में राहुल गांधी के खिलाफ दायर मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान सावरकर परिवार के सदस्य सत्यकी सावरकर की गवाही ने राजनीतिक बहस को नया मोड़ दे दिया है। जिरह में नाथूराम गोडसे और गोपाल गोडसे के RSS से जुड़े होने की बात सामने आई। सावरकर की दया याचिकाओं और गांधी हत्या मामले में सावरकर की भूमिका को लेकर भी सवाल-जवाब हुए।
राहुल गांधी के खिलाफ विनायक दामोदर सावरकर से जुड़े कथित मानहानिकारक बयान को लेकर पुणे की विशेष MP-MLA अदालत में चल रही आपराधिक मानहानि की सुनवाई इन दिनों राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गई है। सावरकर के परपोते और इस मामले के शिकायतकर्ता सत्यकी सावरकर की जिरह में ऐसे सवाल-जवाब सामने आए हैं, जिनका असर सावरकर की विरासत, RSS और महात्मा गांधी की हत्या से जुड़े पुराने राजनीतिक विवाद पर पड़ सकता है।
17 अगस्त 2026 को हुई जिरह में सत्यकी सावरकर ने स्वीकार किया कि उनके नाना गोपाल गोडसे और उनके बड़े मामा नाथूराम गोडसे RSS के सक्रिय सदस्य थे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि गोपाल गोडसे और विनायक दामोदर सावरकर महात्मा गांधी की हत्या के मामले में आरोपी बनाए गए थे।
राहुल गांधी के खिलाफ मामला क्या है?
यह मामला राहुल गांधी के मार्च 2023 में लंदन में दिए गए भाषण से जुड़ा है। सत्यकी सावरकर ने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी ने उनके परदादा विनायक दामोदर सावरकर के बारे में आपत्तिजनक और मानहानिकारक बातें कही थीं।
मामले की सुनवाई के दौरान राहुल गांधी के वकील मिलिंद डी. पवार ने सत्यकी सावरकर से सावरकर परिवार, गोडसे परिवार, महात्मा गांधी की हत्या और RSS से जुड़े कई सवाल किए।
सत्यकी सावरकर की गवाही के दौरान उनके पारिवारिक संबंध भी अदालत के सामने आए। उन्होंने बताया कि गोपाल गोडसे उनके नाना थे और उनकी मां हिमानी सावरकर, गोपाल गोडसे की बेटी थीं। यानी सावरकर और गोडसे परिवारों के बीच पारिवारिक संबंध भी इस जिरह का हिस्सा बने।
अदालत में नाथूराम और गोपाल गोडसे को लेकर क्या कहा गया?
जिरह के दौरान सत्यकी सावरकर ने स्वीकार किया कि नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या की थी।
उन्होंने यह भी माना कि उनके नाना गोपाल गोडसे और विनायक दामोदर सावरकर गांधी हत्या मामले में आरोपी बनाए गए थे। हालांकि, गांधी हत्या मामले में सावरकर को अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था—इसलिए केवल आरोपी बनाए जाने को दोष सिद्ध होने के अर्थ में नहीं देखा जा सकता।
जिरह में गांधी हत्या मामले के अन्य आरोपियों और उनकी सजाओं को लेकर भी सवाल हुए। नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को मृत्युदंड तथा गोपाल गोडसे को उम्रकैद की सजा दिए जाने का तथ्य भी सामने आया।
सबसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्सा तब आया जब सत्यकी सावरकर से पूछा गया कि क्या नाथूराम गोडसे और गोपाल गोडसे RSS के सक्रिय सदस्य थे। उन्होंने दोनों के RSS से सक्रिय रूप से जुड़े होने की बात स्वीकार की।
हालांकि, इस बयान का मतलब यह नहीं है कि अदालत ने RSS और गांधी हत्या के बीच किसी आपराधिक संबंध को स्थापित कर दिया है। यह वर्तमान मानहानि मुकदमे में हुई जिरह के दौरान गवाह द्वारा दिया गया बयान है और मामले की सुनवाई अभी जारी है।
सावरकर की दया याचिकाओं पर भी हुई लंबी जिरह
मामले की सुनवाई में विनायक दामोदर सावरकर द्वारा ब्रिटिश सरकार को भेजी गई दया याचिकाएं भी चर्चा का प्रमुख विषय बनी हैं।
जून 2026 में हुई जिरह के दौरान सत्यकी सावरकर ने स्वीकार किया था कि सावरकर ने ब्रिटिश सरकार के सामने 10 clemency petitions दाखिल की थीं। उन्होंने यह भी माना कि किसी कैदी के लिए दया याचिका दाखिल करना अनिवार्य नहीं था और यह संबंधित कैदी के निर्णय पर निर्भर करता था।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि “सावरकर ने कितनी दया याचिकाएं दाखिल कीं” और उन याचिकाओं की भाषा और राजनीतिक मंशा क्या थी—इन दोनों सवालों को अलग-अलग देखना जरूरी है।
सत्यकी सावरकर ने अदालत में याचिकाओं की संख्या स्वीकार की, लेकिन उन्होंने यह नहीं माना कि उनकी भाषा ब्रिटिश सरकार के प्रति विनम्रता या वफादारी व्यक्त करने वाली थी। यही मुद्दा मामले में ऐतिहासिक व्याख्या की बहस को जन्म देता है।
क्या कोर्ट ने “माफीनामा” साबित कर दिया?
यहां सावधानी जरूरी है।
राजनीतिक बहस में इन दस्तावेजों को अक्सर “माफीनामा” कहा जाता है, जबकि कानूनी और ऐतिहासिक संदर्भ में इन्हें mercy/clemency petitions कहा जाता है। इन दस्तावेजों की भाषा, उद्देश्य और ब्रिटिश सरकार से रिहाई की मांग पर इतिहासकारों में लंबे समय से बहस रही है।
इसलिए यह कहना कि “कोर्ट ने साबित कर दिया कि सावरकर ने माफी मांगी थी” संपादकीय रूप से बहुत आगे जाना होगा। अधिक सटीक बात यह है कि सावरकर द्वारा ब्रिटिश सरकार को clemency petitions दिए जाने का तथ्य अदालत में हुई जिरह का हिस्सा बना है और सत्यकी सावरकर ने ऐसी 10 याचिकाओं का उल्लेख स्वीकार किया है।
RSS और गोडसे का मुद्दा फिर क्यों उठा?
सत्यकी सावरकर की हालिया गवाही इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि RSS लंबे समय से यह कहता रहा है कि नाथूराम गोडसे का गांधी हत्या के समय संगठन से संबंध नहीं था।
अब इसी मामले में सावरकर परिवार से आने वाले एक गवाह ने अदालत में नाथूराम गोडसे और गोपाल गोडसे दोनों को RSS का सक्रिय सदस्य बताया है। यही वह बिंदु है जिसने पुराने विवाद को फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
हालांकि, अदालत में कुछ अन्य दावों के जवाब में सत्यकी सावरकर ने यह भी कहा कि उन्हें कई विशिष्ट ऐतिहासिक घटनाओं या व्यक्तियों के बारे में जानकारी नहीं थी। इसलिए उनकी पूरी गवाही को संदर्भ से काटकर देखना उचित नहीं होगा।
BJP-RSS के लिए सावरकर की विरासत पर नई राजनीतिक चुनौती?
विनायक दामोदर सावरकर लंबे समय से BJP और RSS की वैचारिक राजनीति में महत्वपूर्ण प्रतीक रहे हैं। ऐसे में उनके परिवार से जुड़े व्यक्ति द्वारा अदालत में दिए गए बयान स्वाभाविक रूप से राजनीतिक महत्व हासिल कर रहे हैं।
लेकिन यह कहना कि BJP या RSS अब “सावरकर से दूरी बनाने के लिए मजबूर” हो गए हैं, फिलहाल एक राजनीतिक विश्लेषण होगा, अदालत का निष्कर्ष नहीं।
वास्तविक राजनीतिक चुनौती यह है कि सावरकर की विरासत को लेकर BJP-RSS की स्थापित राजनीतिक व्याख्या और अदालत में जिरह के दौरान सामने आए ऐतिहासिक दस्तावेजों तथा पारिवारिक बयानों के बीच विपक्ष किस तरह का राजनीतिक नैरेटिव बनाता है।
कांग्रेस के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राहुल गांधी लंबे समय से सावरकर की भूमिका, उनकी दया याचिकाओं और हिंदुत्व की राजनीति को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। अब उन्हीं मुद्दों से जुड़े सवाल एक ऐसे मुकदमे की जिरह में सामने आ रहे हैं, जिसे स्वयं सावरकर परिवार के सदस्य ने राहुल गांधी के खिलाफ दायर किया है।
लेकिन मुकदमे का फैसला अभी बाकी है
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यही है कि अभी अदालत ने राहुल गांधी के खिलाफ आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं दिया है।
17 अगस्त की जिरह में गांधी हत्या, गोडसे परिवार, RSS, हिंदू महासभा और सावरकर परिवार के संबंधों पर सवाल हुए। शिकायतकर्ता के वकील ने इनमें से कुछ सवालों की प्रासंगिकता पर आपत्ति भी जताई और अदालत ने कहा कि इन आपत्तियों पर अंतिम निर्णय के समय विचार किया जाएगा।
अगली सुनवाई 1 सितंबर 2026 को होने की रिपोर्ट है।
इसलिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि अदालत ने इतिहास का अंतिम फैसला सुना दिया है। सवाल यह है कि इस मुकदमे की जिरह से सामने आ रहे दस्तावेज और बयान आने वाले दिनों में सावरकर, RSS और गोडसे को लेकर BJP-कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई को कितना बदलेंगे।
और शायद यही इस मुकदमे की सबसे बड़ी विडंबना है—जिस मामले की शुरुआत राहुल गांधी द्वारा सावरकर पर कथित मानहानिकारक टिप्पणी के आरोप से हुई थी, उसकी जिरह अब खुद सावरकर की ऐतिहासिक भूमिका, गोडसे परिवार और RSS के पुराने संबंधों पर बहस का मंच बन गई है।
