August 15, 2026 12:12 am
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राहुल गांधी के दांव से बैकफुट पर मोदी सरकार?

राहुल गांधी और विपक्ष ने मानसून सत्र 2026 में छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई, FCRA, परिसीमन और वन नेशन वन इलेक्शन जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरा। जानिए विपक्ष इसे अपनी जीत क्यों बता रहा है।

मानसून सत्र में विपक्ष ने कैसे बदली संसद की कहानी

संसद का 2026 का मानसून सत्र खत्म हो गया है और इसके साथ ही यह सवाल भी तेज हो गया है कि आखिर इस पूरे सत्र में राजनीतिक बढ़त किसके पास रही—सत्ता पक्ष के पास या विपक्ष के पास? कांग्रेस और विपक्ष का दावा है कि संख्याबल में कमजोर होने के बावजूद उन्होंने जिस तरह मुद्दों को लगातार संसद के भीतर और बाहर उठाया, उससे मोदी सरकार को कई अहम मुद्दों पर पीछे हटना पड़ा।

विपक्ष के इस आकलन में सबसे बड़ा नाम नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का है। उनका कहना है कि विपक्ष ने पूरे सत्र में एजेंडा सेट करने की कोशिश की और सरकार को उन मुद्दों पर जवाब देने के लिए मजबूर किया, जिनसे वह बचना चाहती थी।

मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त को समाप्त हुआ। सरकार की ओर से सत्र को विधायी कामकाज की दृष्टि से सफल बताया गया, जबकि विपक्ष ने इसे सरकार की राजनीतिक और संसदीय रणनीति की विफलता के तौर पर पेश किया।

मोदी-शाह की गैरमौजूदगी बनी विपक्ष का बड़ा मुद्दा

सत्र के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सदन में मौजूदगी को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि दिल्ली में छात्र प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों पर सरकार जवाब देने से बच रही है।

यही वजह थी कि संसद परिसर के बाहर विपक्ष लगातार प्रदर्शन करता रहा और गृह मंत्री से सदन में आकर जवाब देने की मांग करता रहा। रिपोर्टों के मुताबिक, छात्र आंदोलन और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई मानसून सत्र के दौरान सरकार और विपक्ष के बीच टकराव का एक बड़ा केंद्र बन गए।

विपक्ष का तर्क था कि अगर पुलिस कार्रवाई गृह मंत्रालय के अधीन दिल्ली पुलिस के निर्देश पर हुई, तो इसकी राजनीतिक जिम्मेदारी गृह मंत्री अमित शाह की बनती है। राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को लगातार उठाया और पुलिस कार्रवाई में घायल छात्रों को लेकर सरकार से जवाब मांगा।

20 जुलाई के बाद बदला संसद का राजनीतिक माहौल

सत्र शुरू होने से पहले ही छात्र आंदोलनों और पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर विपक्ष सरकार पर हमलावर था। लेकिन 20 जुलाई के बाद दिल्ली में हुए छात्र प्रदर्शनों और पुलिस कार्रवाई ने इस टकराव को और तीखा कर दिया।

राहुल गांधी ने घायल छात्रों के मुद्दे को सार्वजनिक तौर पर उठाया। उनके साथ विपक्षी दलों और छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं।

इससे विपक्ष को एक ऐसा मुद्दा मिल गया, जिसे वह संसद के अंदर और बाहर दोनों जगह लगातार उठा सकता था।

यहीं से विपक्ष की रणनीति का असर दिखाई देने लगा। सरकार की ओर से छात्र आंदोलन पर जवाब देने की मांग लगातार सामने आती रही और संसद की कार्यवाही बार-बार इसी राजनीतिक टकराव की चपेट में आती रही।

चार मुद्दे, जिन पर विपक्ष अपनी जीत बता रहा है

विपक्ष का दावा है कि मानसून सत्र में सरकार की प्रस्तावित रणनीति पूरी तरह कामयाब नहीं हो सकी। खास तौर पर चार मुद्दों को विपक्ष अपनी राजनीतिक उपलब्धि के तौर पर देख रहा है।

1. वन नेशन, वन इलेक्शन आगे नहीं बढ़ा

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पहले ही संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजे जा चुके थे। मानसून सत्र में इस पर आगे बढ़ने की उम्मीद थी, लेकिन समिति की रिपोर्ट और व्यापक विचार-विमर्श के कारण विधेयक आगे नहीं बढ़ सका।

सत्र से पहले ही खबरें थीं कि समिति को और समय की जरूरत पड़ सकती है।

इसलिए विपक्ष के लिए यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक राहत रही।

2. परिसीमन का मुद्दा संसद में नहीं आया

मानसून सत्र से पहले सबसे बड़ी राजनीतिक आशंकाओं में परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संभावित संवैधानिक संशोधन शामिल थे।

विपक्ष को आशंका थी कि सरकार लोकसभा में अपने मौजूदा संख्याबल और विपक्षी खेमे में हुए राजनीतिक बदलावों का इस्तेमाल करके दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर सकती है।

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ जैसे संविधान संशोधन विधेयकों को पारित करने के लिए संसद में विशेष बहुमत की जरूरत होती है। यही वजह है कि सत्र से पहले संख्याबल को लेकर काफी राजनीतिक हलचल थी।

लेकिन मानसून सत्र समाप्त होने तक परिसीमन से जुड़ा वह बड़ा संवैधानिक कदम सामने नहीं आया, जिसकी विपक्ष को आशंका थी।

3. 30 दिन में मंत्री की बर्खास्तगी वाला विधेयक भी आगे नहीं बढ़ा

संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 को लेकर भी विपक्ष ने तीखा विरोध किया था। प्रस्तावित कानून में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को गंभीर आपराधिक मामलों में लगातार 30 दिन हिरासत में रहने की स्थिति में पद से हटाने का प्रावधान था।

कांग्रेस सहित विपक्ष ने इस विधेयक को लेकर गंभीर आपत्तियां उठाई थीं।

मानसून सत्र में इस मुद्दे पर भी सरकार अपनी प्रस्तावित गति से आगे नहीं बढ़ सकी।

4. FCRA विधेयक JPC के पास गया

यह विपक्ष के लिए सबसे ठोस संसदीय उपलब्धियों में से एक रही।

Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को लोकसभा ने संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेज दिया। विपक्ष इस विधेयक को लेकर व्यापक चर्चा और जांच की मांग कर रहा था।

यानी सरकार के सामने इस विधेयक को तत्काल पारित कराने के बजाय अब संसदीय समिति की विस्तृत जांच का रास्ता है।

क्या राहुल गांधी ने सरकार का एजेंडा बदल दिया?

यही इस पूरे सत्र का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है।

संसद में विपक्ष के पास सरकार के मुकाबले संख्या कम है। ऐसे में उसके पास दो विकल्प थे—या तो संख्याबल के आधार पर हर विधेयक पर सरकार से मुकाबला करे या फिर ऐसे राजनीतिक मुद्दे तलाशे जिन पर सरकार को सार्वजनिक रूप से जवाब देना पड़े।

राहुल गांधी और विपक्ष ने दूसरा रास्ता चुना।

छात्र आंदोलन, पुलिस कार्रवाई, पेपर लीक, FCRA, परिसीमन और राम मंदिर से जुड़े चंदे के आरोपों जैसे मुद्दों को लगातार उठाकर विपक्ष ने सरकार को रक्षात्मक स्थिति में रखने की कोशिश की।

राम मंदिर ट्रस्ट के चंदे को लेकर लगाए गए आरोप भी विपक्ष के एजेंडे का हिस्सा रहे, हालांकि इन आरोपों पर अलग-अलग पक्षों के दावे हैं और इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।

आखिरी दिन क्या हुआ?

मानसून सत्र के आखिरी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सदन में मौजूद रहे। लेकिन विपक्ष ने सवाल उठाया कि यदि सरकार को विपक्ष की बात का जवाब देना था, तो यह मौजूदगी पूरे सत्र में क्यों नहीं दिखाई दी।

आखिरी दिन सदन में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी।

यानी जिस दिन विपक्ष प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की मौजूदगी में बहस की उम्मीद कर रहा था, उसी दिन सदन की कार्यवाही समाप्त हो गई।

यही दृश्य विपक्ष के उस राजनीतिक नैरेटिव को मजबूती देता है कि सरकार और विपक्ष के बीच पूरे सत्र में वास्तविक बहस के बजाय टकराव और गतिरोध हावी रहा।

हालांकि सरकार का पक्ष इससे अलग है। सरकार ने विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने और महत्वपूर्ण विधायी कामकाज को रोकने का आरोप लगाया। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, मानसून सत्र में 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन लोकसभा की उत्पादकता महज 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत रही।

तो क्या सचमुच विपक्ष ने मानसून सत्र जीत लिया?

अगर ‘जीत’ का मतलब ज्यादा विधेयक पारित कराना है, तो विपक्ष के लिए इसे जीत कहना मुश्किल होगा। सरकार ने कई विधायी काम पूरे किए और 12 विधेयक संसद से पारित हुए।

लेकिन अगर ‘जीत’ का मतलब राजनीतिक नैरेटिव तय करना और सरकार को रक्षात्मक स्थिति में धकेलना है, तो विपक्ष के पास इसे अपनी उपलब्धि बताने के लिए पर्याप्त आधार जरूर है।

FCRA विधेयक का JPC में जाना, वन नेशन-वन इलेक्शन पर आगे की देरी और परिसीमन जैसे संभावित बड़े संवैधानिक कदमों का इस सत्र में आगे न बढ़ना विपक्ष के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक बिंदु हैं।

सबसे अहम बात यह है कि विपक्ष ने संख्या कम होने के बावजूद छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों को संसद की बहस के केंद्र में ला दिया।

राहुल गांधी की रणनीति की असली परीक्षा अब होगी

मानसून सत्र की तस्वीर को सिर्फ ‘राहुल गांधी की जीत’ या ‘मोदी सरकार की हार’ के दो खानों में बांटना आसान होगा, लेकिन अधूरा भी।

वास्तविक परीक्षा यह होगी कि विपक्ष इस एकजुटता को आगे कितने समय तक कायम रख पाता है और क्या वह अगले सत्र में भी सरकार को अपने चुने हुए मुद्दों पर जवाब देने के लिए मजबूर कर पाता है।

सरकार के पास अभी भी मजबूत संख्याबल है और कई विधेयक आगे बढ़ाने के लिए उसके पास अगले सत्रों का रास्ता खुला है। वहीं विपक्ष के सामने चुनौती है कि मानसून सत्र में बने राजनीतिक दबाव को स्थायी संसदीय रणनीति में बदले।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि 2026 का मानसून सत्र केवल विधेयकों और संसदीय उत्पादकता का सत्र नहीं रहा। यह सरकार और विपक्ष के बीच नैरेटिव की लड़ाई का सत्र भी रहा—और इस लड़ाई में विपक्ष, खासकर राहुल गांधी, ने सरकार को कई मौकों पर रक्षात्मक मुद्रा में खड़ा करने में सफलता हासिल की।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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