लापता परिजनों की तलाश और ‘साजिश’ की राजनीति
नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में हालात अब ऊपर से सामान्य दिख रहे हैं। ज़्यादातर फैक्ट्रियों में काम फिर से शुरू हो चुका है, लेकिन अंदर ही अंदर असंतोष अभी भी गहरा है। यह सिर्फ वेतन या काम की शर्तों का मुद्दा नहीं रह गया है—अब कई परिवार अपने लापता परिजनों की तलाश में भटक रहे हैं।
लापता मजदूर: परिवारों का बढ़ता संकट
नोएडा के फेज-2 इलाके में कई ऐसे परिवार मिले जो अपने बेटे, भाई या पति को ढूंढ रहे हैं। उनका आरोप है कि पुलिस उनके परिजनों को उठाकर ले गई, लेकिन उनके बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी जा रही।
परिजन लगातार थानों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें जवाब नहीं मिल रहा। यह स्थिति मजदूरों के गुस्से और भय दोनों को बढ़ा रही है।
कैसे भड़का आंदोलन?
यह मजदूर आंदोलन कई दिनों से चल रहा था, जिसमें काम की शर्तों में सुधार और वेतन वृद्धि की मांग की जा रही थी।
13 अप्रैल को यह आंदोलन कुछ जगहों पर हिंसक हो गया:
- कुछ फैक्ट्रियों में तोड़फोड़ और आगजनी
- पुलिस से टकराव
- प्रशासन का सख्त रुख
हालांकि प्रशासन का दावा है कि:
- 80 से ज्यादा जगहों पर प्रदर्शन हुए
- हिंसा सिर्फ 2–3 जगहों तक सीमित रही
- अधिकांश आंदोलन शांतिपूर्ण था
पुलिस कार्रवाई और बढ़ती दहशत
पुलिस के अनुसार:
- 300 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया
- 7 एफआईआर दर्ज की गईं
लेकिन मजदूरों का कहना है कि इस कार्रवाई से दहशत का माहौल बन गया है।
‘साजिश’ बनाम वास्तविक मुद्दे
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे विवादास्पद पहलू है—‘साजिश’ का नैरेटिव।
- योगी आदित्यनाथ ने इसमें ‘नक्सली साजिश’ की बात कही
- राज्य के श्रम मंत्री ने ‘पाकिस्तान कनेक्शन’ तक जोड़ दिया
जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही इशारा करती है।
असल वजह: महंगाई और कम वेतन
मजदूरों की मुख्य मांगें साफ हैं:
- न्यूनतम वेतन ₹20,000 किया जाए
- 12 घंटे काम के हिसाब से उचित भुगतान
- काम की बेहतर स्थितियां
मजदूर सवाल उठाते हैं:
जब पूरे देश में महंगाई समान रूप से बढ़ रही है, तो वेतन वृद्धि भी समान क्यों नहीं?
सरकार द्वारा हाल में की गई वेतन वृद्धि:
- ₹2000
- ₹2300
- ₹2600
- ₹2900
मजदूर इसे “नाममात्र” बताते हैं।
फैक्ट्रियों की अमानवीय स्थितियां
मजदूरों की शिकायतें सिर्फ वेतन तक सीमित नहीं हैं:
- खराब टॉयलेट सुविधाएं
- घटिया या अनुपस्थित कैंटीन व्यवस्था
- लंबे कार्य घंटे
घरेलू कामगार भी आंदोलन में शामिल
अब यह असंतोष सिर्फ फैक्ट्री मजदूरों तक सीमित नहीं रहा।
नोएडा की घरेलू कामगार महिलाएं (मेट्स) भी आंदोलन में उतर आई हैं:
- लगातार दो दिन काम का बहिष्कार
- वेतन वृद्धि की मांग
उनका कहना है कि:
₹400 के आसपास गैस सिलेंडर खरीदना और घर चलाना बेहद मुश्किल हो गया है
मीडिया और सरकार पर सवाल
मजदूरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि:
- मीडिया ने असल मुद्दों से ध्यान हटाकर ‘साजिश’ का नैरेटिव बनाया
- सरकार ने समस्याओं को हल करने के बजाय उन्हें राजनीतिक रंग दिया
निष्कर्ष: संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ
नोएडा में फिलहाल शांति जरूर दिख रही है, लेकिन यह सतही है।
- मजदूरों में असंतोष कायम है
- कई परिवार अपने लापता सदस्यों की तलाश में हैं
- वेतन और काम की स्थितियों को लेकर संघर्ष जारी है
अगर सरकार ने इन जायज मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो यह आंदोलन और तेज हो सकता है।
