मेरठ में बुलडोज़र कार्रवाई के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग
उत्तर प्रदेश के मेरठ से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो हाल के वर्षों में “बुलडोज़र राजनीति” के सबसे बड़े सवालों में से एक को उजागर करती है। इस बार विरोध किसी विपक्षी समूह या अल्पसंख्यक समुदाय का नहीं, बल्कि खुद उन लोगों का है जिन्हें आमतौर पर भाजपा का समर्थक माना जाता रहा है।
“कटोरा आ गया हाथ में…”— नारों में झलकता गुस्सा
वीडियो में साफ सुनाई देता है कि लोग खुलेआम सरकार के खिलाफ नारे लगा रहे हैं—
“नरेंद्र मोदी तेरे राज में कटोरा आ गया हाथ में…”,
“योगी आदित्यनाथ तेरे राज में कटोरा आ गया हाथ में…”,
“अमित शाह तेरे राज में कटोरा आ गया हाथ में…”
ये नारे सिर्फ गुस्से का इज़हार नहीं हैं, बल्कि उस आर्थिक और सामाजिक संकट को दर्शाते हैं जिसमें व्यापारी, स्कूल संचालक और अस्पताल चलाने वाले लोग खुद को फंसा हुआ पा रहे हैं।
बुलडोज़र कार्रवाई और सीलिंग: क्या हो रहा है मेरठ में?
मेरठ के सबसे बड़े और अहम माने जाने वाले सेंट्रल बाजार में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ और सीलिंग की कार्रवाई की जा रही है। दुकानों, स्कूलों और यहां तक कि अस्पतालों को भी बंद कर दिया गया है।
- कई दुकानदारों का कहना है कि उन्होंने पहले ही पैसे जमा कर दिए थे
- इसके बावजूद बिना सुनवाई के सीलिंग कर दी गई
- अस्पतालों में भर्ती मरीजों और स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया
लोगों का सवाल है—“क्या इसी दिन के लिए हमने भाजपा को वोट दिया था?”
भाजपा के ‘अपने’ क्यों उतरे सड़क पर?
यह विरोध इसलिए भी अहम है क्योंकि इसमें शामिल लोग खुद को भाजपा समर्थक बताते हैं। वे कह रहे हैं कि उन्होंने भरोसा करके वोट दिया, लेकिन अब वही सरकार उनके रोज़गार पर बुलडोज़र चला रही है।
कुछ प्रदर्शनकारियों ने यहां तक कहा कि वे अब कभी भाजपा को वोट नहीं देंगे।
‘राम’ के नाम पर राजनीति और ज़मीनी हकीकत
प्रदर्शन के दौरान लोगों ने अरुण गोविल का भी जिक्र किया, जो ‘रामायण’ में भगवान राम का किरदार निभाने के कारण भाजपा से जुड़े एक प्रतीक बन चुके हैं। लोगों का सवाल था कि “राम के नाम पर वोट लेने वालों ने आखिर हमें क्या दिया?”
यह सवाल सीधे उस राजनीतिक नैरेटिव को चुनौती देता है, जिसमें धार्मिक प्रतीकों के सहारे समर्थन जुटाया जाता रहा है।
मेरठ बंद का आह्वान और बढ़ता असंतोष
स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि “मेरठ बंद” का आह्वान किया गया है। सड़कों पर उतरकर लोग सरकार से जवाब मांग रहे हैं—
- क्या बिना पुनर्वास के ऐसे एक्शन जायज़ हैं?
- क्या छोटे व्यापारियों और आम लोगों की सुनवाई नहीं होगी?
- क्या विकास के नाम पर रोज़गार छीनना ही नीति बन गई है?
बुलडोज़र राजनीति पर बड़ा सवाल
उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में “बुलडोज़र” सरकार की पहचान बन गया है। लेकिन मेरठ की यह घटना दिखाती है कि जब यही कार्रवाई आम लोगों और समर्थकों तक पहुंचती है, तो समर्थन कैसे विरोध में बदल जाता है।
यह घटना सिर्फ एक शहर की नहीं, बल्कि उस व्यापक बहस का हिस्सा है जिसमें सवाल उठ रहा है—
क्या कानून और विकास के नाम पर किए जा रहे कदम वास्तव में न्यायपूर्ण हैं?
निष्कर्ष
मेरठ की सड़कों पर गूंज रहे नारों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आर्थिक संकट, रोज़गार का नुकसान और प्रशासनिक कठोरता अब राजनीतिक समर्थन को भी प्रभावित कर रही है। यह मामला आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति और भाजपा की रणनीति—दोनों के लिए एक बड़ा संकेत बन सकता है।
