रामनवमी या शक्ति प्रदर्शन? हथियारों के साये में त्योहार और सियासत का सच
हर साल आने वाला रामनवमी का त्योहार इस बार भी देश के कई हिस्सों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। लेकिन वजह आस्था नहीं, बल्कि आस्था के नाम पर किया जा रहा शक्ति प्रदर्शन है।
सोशल मीडिया की टाइमलाइन इन दिनों ऐसे वीडियो से भरी हुई है, जिनमें जुलूसों के दौरान तलवारें लहराई जा रही हैं, बंदूकों का प्रदर्शन हो रहा है, तेज़ आवाज़ में डीजे बज रहा है और उकसाने वाले नारे लगाए जा रहे हैं। इन दृश्यों को देखकर सवाल उठना लाज़मी है—क्या यह भगवान राम का जन्मोत्सव है या किसी युद्ध का उद्घोष?
राम के नाम पर आक्रामकता क्यों?
भगवान राम भारतीय समाज में मर्यादा, संयम और न्याय के प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन आज उन्हीं के नाम पर आक्रामकता और शक्ति प्रदर्शन क्यों दिख रहा है?
यह प्रवृत्ति केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहरे तौर पर राजनीतिक भी नजर आती है। खासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को लेकर लगातार यह आरोप लगता रहा है कि वे डर और ध्रुवीकरण की रणनीति पर काम करती हैं।
चुनावी राज्यों में बढ़ती गतिविधियां
इस बार सबसे अधिक ऐसे दृश्य पश्चिम बंगाल से सामने आए, जहां आने वाले समय में चुनाव होने हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशें तेज़ हो जाती हैं, ताकि वोटों का बंटवारा धार्मिक आधार पर किया जा सके।
बंगाल में रामनवमी जुलूसों के दौरान जिस तरह के दृश्य सामने आए, उन्होंने इस बहस को और तेज़ कर दिया है कि क्या त्योहारों को जानबूझकर राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।
नफरत के बीच उम्मीद की तस्वीर
हालांकि, इसी देश में ऐसी तस्वीरें भी सामने आईं जो उम्मीद जगाती हैं। कोलकाता में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने रामनवमी जुलूसों का फूल बरसाकर स्वागत किया।
इसी तरह जयपुर और संभल में ईद के मौके पर हिंदू समुदाय के लोगों ने नमाजियों पर फूल बरसाए थे।
ये दृश्य इस बात की याद दिलाते हैं कि भारत की असली पहचान आपसी भाईचारे और सह-अस्तित्व में है, न कि नफरत और टकराव में।
क्या धर्म खतरे में है या देश?
आज यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है कि क्या सच में धर्म खतरे में है, या फिर यह सिर्फ एक राजनीतिक नैरेटिव है?
वास्तविकता यह है कि जब धर्म के नाम पर नफरत फैलाई जाती है, तो उसका नुकसान सभी को होता है—चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान।
खतरा अगर है, तो वह देश की सामाजिक एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए है।
निष्कर्ष
रामनवमी जैसे त्योहारों को आस्था और शांति का प्रतीक होना चाहिए। लेकिन जब वे शक्ति प्रदर्शन और राजनीतिक एजेंडे का माध्यम बन जाते हैं, तो यह न सिर्फ धर्म की मूल भावना के खिलाफ है, बल्कि समाज के लिए भी खतरनाक संकेत है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम त्योहारों की असली भावना को समझें और नफरत की राजनीति से ऊपर उठकर एकजुट समाज का निर्माण करें।
