March 23, 2026 1:27 am
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कल तक एक-दूसरे को गाली देते-देते गले मिल पड़े

असम कांग्रेस नेता Pradyut Bordoloi के BJP में शामिल होने से सियासत गरम। चुनाव से पहले कांग्रेस को बड़ा झटका, जानिए पूरी कहानी।

असम की सियासत में पलटी: कांग्रेस के बोरदोलोई का बीजेपी में जाना—विचारधारा बनाम अवसरवाद?

असम की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी है, जहाँ विचारधारा और अवसरवाद के बीच की रेखा धुंधली होती दिख रही है। जो नेता कल तक एक-दूसरे को भ्रष्ट, नफरत फैलाने वाला और लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे थे, आज वही एक-दूसरे को “सच्चा नेता” बताकर गले मिलते नजर आ रहे हैं।

🔁 राजनीतिक विरोध से साथ तक का सफर

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और Nagaon से सांसद प्रद्युत बोरदोलोई ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है। यह वही बोरदोलोई हैं, जिन्होंने हाल के वर्षों में हिमंता बिस्वा सरमा और उनकी सरकार को असम की राजनीति का “सबसे चालाक और भ्रष्ट सत्ता खिलाड़ी” बताया था।

लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है—सोशल मीडिया पर दोनों पक्ष एक-दूसरे की तारीफ करते दिखाई दे रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह बदलाव विचारधारा का है या सिर्फ सत्ता समीकरणों का?

🧩 कांग्रेस की रणनीति पर सवाल

बोरदोलोई का यह कदम कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति पर भी सवाल खड़े करता है। आखिर ऐसे नेताओं पर दांव क्यों लगाया गया जो अवसर मिलते ही न केवल पार्टी बदलते हैं बल्कि उस दल में शामिल हो जाते हैं जिसे वे देश की एकता और भाईचारे के लिए खतरा बताते थे?

बोरदोलोई का राजनीतिक करियर लंबा रहा है—

  • चार बार विधायक
  • पूर्व केंद्रीय मंत्री
  • वर्तमान सांसद (अभी लगभग तीन साल का कार्यकाल बाकी था)

उनके साथ ही असम कांग्रेस के उपाध्यक्ष नवज्योति तालुकदार ने भी इस्तीफा दे दिया है, जो इस झटके को और बड़ा बनाता है।

🗳️ चुनाव से ठीक पहले बड़ा झटका

यह राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब असम में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं।

  • मतदान: 9 अप्रैल से
  • नतीजे: 4 मई

ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस नुकसान से कैसे उबरती है और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार को किस तरह चुनौती देती है।

⚖️ विचारधारा बनाम सत्ता की राजनीति

यह घटना सिर्फ एक नेता के दल बदलने की नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति में उस व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाती है जहाँ विचारधारा अक्सर सत्ता के सामने कमजोर पड़ जाती है।

कल तक जिस विचारधारा के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा रही थी, आज उसी के साथ खड़े होना—क्या यह जनता के भरोसे के साथ धोखा नहीं है?

📌 निष्कर्ष

असम की यह घटना भारतीय राजनीति के उस चेहरे को उजागर करती है जहाँ सिद्धांतों की जगह अवसरवाद लेता जा रहा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या मतदाता इस बदलाव को स्वीकार करेंगे या इसे राजनीतिक अवसरवाद के रूप में देखेंगे।

मुकुल सरल

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