March 22, 2026 4:44 am
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ये है मेरा भारत: राम के बिना रमजान कहां!

ईद के मौके पर जयपुर, दिल्ली, अमरोहा और संभल से आईं तस्वीरें बताती हैं कि नफ़रत के दौर में भी भारत में सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारा जिंदा है।

नफ़रत के दौर में भी ज़िंदा है मोहब्बत और साझी संस्कृति की रूह

ईद का त्योहार सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारत की साझा संस्कृति, गंगा-जमुनी तहज़ीब और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक है। इस साल भी, जब एक तरफ़ देश में नफ़रत की राजनीति और ध्रुवीकरण का माहौल गहराता दिखता है, वहीं दूसरी तरफ़ कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आईं, जिन्होंने इस धारणा को चुनौती दी—और याद दिलाया कि “ये है मेरा इंडिया, ये मेरा भारत है।”

जयपुर से आई मोहब्बत की तस्वीर

जयपुर के ईदगाह से आई एक तस्वीर ने पूरे देश का ध्यान खींचा। यहां हिंदू समुदाय के लोग नमाज़ पढ़ रहे मुसलमानों पर फूल बरसाते हुए दिखाई दिए। वे “ईद मुबारक” और “हार्दिक बधाई” कहते हुए इस त्योहार को साझा कर रहे थे।

यह दृश्य सिर्फ एक क्षणिक घटना नहीं, बल्कि उस भारत की झलक है जो आज भी नफ़रत की राजनीति के सामने पूरी तरह झुका नहीं है। यह उन ताकतों के लिए “बर्नॉल मोमेंट” है जो देश को धार्मिक आधार पर बांटने की कोशिश करती हैं।

दिल्ली में पुलिस पर बरसे फूल

देश की राजधानी दिल्ली के उत्तम नगर इलाके से भी एक दिल छू लेने वाली खबर सामने आई। यहां ईद के मौके पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने वहां तैनात पुलिसकर्मियों पर फूल बरसाए।

यह gesture सिर्फ धन्यवाद नहीं था, बल्कि एक संदेश था—कि तमाम तनाव, धमकियों और नफ़रत के माहौल के बावजूद, अगर त्योहार शांति से मन पाए, तो उसमें प्रशासन की भूमिका को भी स्वीकार किया जाना चाहिए।

अमरोहा और संभल से भी आईं सकारात्मक खबरें

अमरोहा और संभल जैसे इलाकों से भी ऐसी खबरें सामने आईं, जहां अक्सर सांप्रदायिक तनाव की आशंका बनी रहती है। इन क्षेत्रों में भी इस बार ईद अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण माहौल में मनाई गई और लोगों ने एक-दूसरे को बधाई देकर भाईचारे का संदेश दिया।

नफ़रत बनाम हकीकत: भारत अभी भी पूरी तरह नहीं बदला

यह कहना गलत नहीं होगा कि देश में नफ़रत फैलाने वाली ताकतों की संख्या बढ़ी है। कई मौकों पर हिंसा, उकसावे और सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं भी सामने आती हैं। लेकिन इन सबके बीच यह भी उतना ही सच है कि भारत की आत्मा अभी पूरी तरह से नफ़रत के आगे समर्पण नहीं कर पाई है।

जयपुर, दिल्ली, अमरोहा और संभल की ये घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि आम लोग अब भी शांति, सद्भाव और साथ मिलकर रहने की परंपरा को ज़िंदा रखना चाहते हैं।

गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीवित मिसाल

भारत की पहचान उसकी विविधता में एकता है। यहां त्योहार सिर्फ एक समुदाय का नहीं होता—बल्कि पूरे समाज का उत्सव बन जाता है। ईद पर हिंदुओं का फूल बरसाना, और मुसलमानों का पुलिस और प्रशासन को धन्यवाद देना—ये सब उसी साझा संस्कृति की मिसालें हैं।

निष्कर्ष

नफ़रत की राजनीति चाहे जितनी तेज़ क्यों न हो, भारत की ज़मीन पर मोहब्बत के बीज अब भी जिंदा हैं। ये छोटे-छोटे दृश्य, ये इंसानी रिश्ते—यही इस देश की असली ताकत हैं।

“ये है मेरा इंडिया, ये मेरा भारत है”—जहां हर चुनौती के बावजूद इंसानियत जीतने की कोशिश करती है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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