क्या बीजेपी अब छात्रों और सवाल पूछने वाले युवाओं को निशाना बना रही है?
पढ़ने-लिखने वाले छात्रों को राजनीति से दूर रहने की सलाह देने वाले संदेशों से लेकर हिंसा और मर्दानगी को महिमामंडित करने वाले मीम्स तक—बीजेपी के कथित नए सोशल मीडिया कैंपेन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का आरोप है कि पार्टी की डिजिटल रणनीति अब असहमति, सवाल पूछने और राजनीतिक रूप से सक्रिय युवाओं को निशाना बनाने की दिशा में बढ़ रही है।
सोशल मीडिया पर सामने आए इन मीम्स को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीतिक बहस का स्तर अब युवाओं को डराने और उन्हें राजनीति से दूर रखने की कोशिश तक पहुंच गया है?
‘पढ़ने-लिखने वाले राजनीति से दूर रहें’—किस तरह का संदेश?
कैंपेन से जुड़े एक वीडियो में पढ़ाई करने वाले छात्रों को राजनीति से दूर रहने और अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने की बात कही जाती है। संदेश का सार यह है कि छात्र पढ़ें-लिखें, IAS बनें और राजनीति से दूरी बनाए रखें।
आलोचकों के मुताबिक, इस तरह का संदेश केवल एक मीम या सोशल मीडिया पोस्ट नहीं है। यह इस सवाल को जन्म देता है कि लोकतंत्र में युवाओं की भूमिका को किस तरह देखा जा रहा है।
छात्र और युवा किसी भी लोकतंत्र में सिर्फ मतदाता नहीं होते। वे नीतियों पर सवाल करते हैं, आंदोलनों में हिस्सा लेते हैं और सत्ता से जवाब मांगते हैं। ऐसे में उन्हें राजनीति से दूर रहने की सलाह देना लोकतांत्रिक भागीदारी को लेकर गंभीर बहस खड़ी करता है।
‘दिमागी नक्सल’ के नाम पर मीम्स की बाढ़
इस कथित सोशल मीडिया कैंपेन में ‘दिमागी नक्सल’ जैसे संदेशों के जरिए राजनीतिक विचारों और असहमति को एक खास फ्रेम में पेश किया जा रहा है। बीजेपी फॉर इंडिया से लेकर विभिन्न राज्यों के बीजेपी सोशल मीडिया हैंडल तक ऐसे मीम्स के प्रसार का दावा किया जा रहा है।
इन मीम्स में फिल्मों और वेब सीरीज के दृश्यों का इस्तेमाल किया गया है। आलोचना का एक पहलू यह भी है कि मनोरंजन की लोकप्रिय छवियों को राजनीतिक संदेशों के लिए इस्तेमाल करते हुए असहमति रखने वालों को हिंसक या संदिग्ध मानसिकता से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
अगर किसी राजनीतिक दल की सोशल मीडिया रणनीति का उद्देश्य ही विरोधी विचार रखने वाले नागरिकों को बदनाम करना या डराना हो, तो यह महज चुनावी प्रचार का मामला नहीं रह जाता। यह लोकतांत्रिक संवाद की भाषा और मर्यादा का सवाल बन जाता है।
रक्षा बंधन के दिन कैंपेन लॉन्च करने पर भी सवाल
इस सोशल मीडिया अभियान के समय को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचना में कहा गया है कि ये मीम्स भाई-बहन के रिश्ते और रक्षा बंधन जैसे त्योहार के दिन सामने आए।
आलोचकों का कहना है कि जिस दिन सार्वजनिक विमर्श में भाई-बहन के रिश्ते, प्रेम और सुरक्षा की बात होनी चाहिए, उस दिन हिंसा और आक्रामकता वाली राजनीतिक भाषा को बढ़ावा देना बीजेपी की डिजिटल राजनीति के चरित्र पर सवाल खड़े करता है।
नई बीजेपी टीम और IT सेल की रणनीति?
इस पूरे अभियान को बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन की नई टीम और पार्टी की नई आईटी रणनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
आलोचकों का आरोप है कि बीजेपी की डिजिटल राजनीति में रचनात्मक राजनीतिक संवाद की जगह तेजी से मीम, ट्रोलिंग, आक्रामक भाषा और विरोधियों को निशाना बनाने वाली सामग्री बढ़ रही है।
यहां सवाल सिर्फ बीजेपी के मीम्स की रचनात्मकता का नहीं है। असली सवाल यह है कि राजनीतिक दल सोशल मीडिया के जरिए जनता को किस तरह का राजनीतिक संदेश दे रहे हैं।
अगर राजनीतिक विरोध का जवाब तर्क से देने के बजाय विरोधी को ‘नक्सल’, ‘देशविरोधी’ या हिंसक मानसिकता वाला बताकर दिया जाएगा, तो इससे समाज में राजनीतिक ध्रुवीकरण और गहरा हो सकता है।
मीम्स में छिपी राजनीति क्या कहती है?
इस कैंपेन के आलोचक इसे बीजेपी की राजनीति की एक बड़ी तस्वीर के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि ऐसे संदेशों के जरिए एक ऐसा राजनीतिक नैरेटिव तैयार किया जा रहा है जिसमें पढ़ने-लिखने वाले, सवाल पूछने वाले और सत्ता की आलोचना करने वाले युवाओं को संदेह की नजर से देखा जाए।
यानी सवाल सिर्फ इस बात का नहीं है कि मीम कितना आपत्तिजनक है। सवाल यह है कि वह मीम किस तरह की राजनीति को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहा है।
क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना समस्या है?
क्या छात्र राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय नहीं रख सकते?
क्या सत्ता की आलोचना करने वाले युवाओं को डराने के बजाय उनके सवालों का जवाब नहीं दिया जाना चाहिए?
हिंसा की भाषा के सामान्य होने का खतरा
सोशल मीडिया पर हिंसक भाषा और हिंसा के प्रतीकों का लगातार इस्तेमाल समाज पर असर डाल सकता है। जब राजनीतिक प्रचार में मारपीट, डराने-धमकाने या आक्रामकता को मनोरंजन और मीम के रूप में पेश किया जाता है, तो हिंसा धीरे-धीरे सामान्य लगने लगती है।
भारत में पिछले एक दशक में राजनीतिक और सामाजिक विवादों के दौरान हिंसा तथा भीड़ की राजनीति को लेकर लगातार बहस होती रही है। आलोचक यह भी आरोप लगाते रहे हैं कि दलितों, मुसलमानों और महिलाओं को कई मामलों में निशाना बनाया गया है।
अब सवाल यह है कि क्या राजनीतिक सोशल मीडिया कैंपेन की भाषा का दायरा और बढ़ रहा है—और क्या छात्र, युवा तथा सत्ता से सवाल पूछने वाले आम नागरिक भी इस आक्रामक राजनीतिक नैरेटिव के निशाने पर आ रहे हैं?
युवाओं को राजनीति से दूर करना या राजनीति पर नियंत्रण?
भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत हो सकता है जब युवा राजनीति को समझें, उसमें भाग लें और सत्ता से सवाल पूछें। पढ़ाई और राजनीति को एक-दूसरे का विरोधी मानना लोकतांत्रिक नागरिकता की व्यापक अवधारणा को कमजोर कर सकता है।
छात्रों का पढ़ना जरूरी है, लेकिन अपने आसपास की राजनीति को समझना भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था को समझने की क्षमता विकसित करना भी है।
इसीलिए बीजेपी के इस कथित सोशल मीडिया कैंपेन पर उठ रहे सवालों को सिर्फ मीम की लड़ाई मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। असली सवाल राजनीतिक भाषा का है—और उस भाषा के जरिए युवाओं तथा असहमति रखने वाले नागरिकों के बारे में कैसी तस्वीर बनाई जा रही है।
लोकतंत्र में असहमति दुश्मनी नहीं होती। सवाल पूछना अपराध नहीं होता। और राजनीति से दूरी बनाना हर शिक्षित नागरिक की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राजनीति को समझना और सत्ता से जवाब मांगना भी लोकतांत्रिक अधिकार है।
