August 23, 2026 8:38 pm
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दिल्ली से कन्याकुमारी की यह अनूठी Bike यात्रा लाएगी क्या बदलाव

सहर हाशमी 20 अगस्त से दिल्ली से कन्याकुमारी तक करीब 7,000 किमी बाइक यात्रा करेंगी। ‘Beyond the Horizon’ अभियान का मकसद मानसिक स्वास्थ्य और stigma पर जागरूकता फैलाना है।

सहर हाशमी की 7,000 किमी बाइक यात्रा मानसिक सेहत के लिए है एक बेबाक अभियान

मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में मौजूद झिझक, शर्म और पूर्वाग्रह के खिलाफ सहर हाश्मी एक बार फिर लंबी बाइक यात्रा पर निकलने जा रही हैं। ‘Beyond the Horizon: Ride for Resilience’ के तहत वह 20 अगस्त से दिल्ली से कन्याकुमारी तक करीब 7,000 किलोमीटर की यात्रा करेंगी। इस दौरान स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, गांवों और विभिन्न संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत और जागरूकता कार्यक्रम किए जाएंगे।

मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना आज भी हमारे समाज में आसान नहीं है। शारीरिक बीमारी के लिए डॉक्टर के पास जाना सामान्य माना जाता है, लेकिन मानसिक परेशानी को लेकर अब भी शर्म, डर, सामाजिक दबाव और ‘लोग क्या कहेंगे’ जैसी मानसिकता बड़ी बाधा बनी हुई है।

इसी सोच को चुनौती देने के लिए सहर हाश्मी एक असाधारण यात्रा पर निकलने जा रही हैं। उनकी पहल ‘Beyond the Horizon: Ride for Resilience’ 20 अगस्त से शुरू होगी और 15 अक्टूबर तक चलेगी। इस यात्रा में वह दिल्ली से कन्याकुमारी तक बाइक से सफर करेंगी और देश के अलग-अलग हिस्सों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लोगों से संवाद करेंगी।

बाइक का जुनून और मानसिक स्वास्थ्य का मिशन

सहर के लिए बाइक सिर्फ एक सवारी का साधन नहीं है। बचपन से ही उन्हें बाइक चलाने का जुनून रहा है। वह बताती हैं कि उनके बड़े भाई उन्हें Royal Enfield पर घुमाने ले जाते थे और तभी उनके मन में यह इच्छा पैदा हुई कि उन्हें भी Royal Enfield ही चलानी है।

आज उनके पास Royal Enfield Meteor 350 है। सहर के लिए यह भारी-भरकम बाइक अब उनके उस जुनून का हिस्सा है, जिसे उन्होंने एक सामाजिक उद्देश्य से जोड़ दिया है।

उनके शब्दों में, लोगों को प्रेरित करना और समाज में बने stereotypes को तोड़ना ही उनकी यात्रा का बड़ा उद्देश्य है।

इस बार उनकी यात्रा का फोकस साफ है—मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता और stigma को चुनौती देना।

दिल्ली से कन्याकुमारी तक हजारों किलोमीटर का सफर

सहर के मुताबिक, इस अभियान के दौरान वह करीब 50 शहरों के अलावा स्कूलों, विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, विभिन्न संस्थानों और गांवों तक पहुंचने की कोशिश करेंगी।

यह सिर्फ बाइक से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने की यात्रा नहीं होगी। हर पड़ाव पर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बातचीत इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।

उनका मकसद है कि मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत केवल अस्पतालों और क्लीनिकों तक सीमित न रहे, बल्कि परिवारों, शैक्षणिक संस्थानों और समाज के सामान्य संवाद का हिस्सा बने।

15 साल तक मानसिक बीमारी के साथ संघर्ष

सहर अपनी मानसिक स्वास्थ्य यात्रा को छिपाने के बजाय सार्वजनिक रूप से साझा करती रही हैं। वह बताती हैं कि उन्हें Borderline Personality Disorder (BPD) है और करीब 15 वर्षों तक उन्होंने इससे जूझते हुए अपनी जिंदगी को संभालने की कोशिश की है।

उनके मुताबिक, एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने महसूस किया कि उन्हें अपनी जिंदगी के बारे में एक बड़ा फैसला लेना होगा और 2016 के आसपास उन्होंने अपने मानसिक स्वास्थ्य, अपनी बीमारी और अपने जीवन के दूसरे निजी अनुभवों के बारे में खुलकर बोलना शुरू किया।

यही खुलापन उनके लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

जब उन्होंने अपनी कहानी लोगों के सामने रखी, तो उन्हें एहसास हुआ कि वह अकेली नहीं हैं। बहुत से लोग ऐसी ही परेशानियों से गुजर रहे हैं, लेकिन उनके पास अपनी बात कहने की जगह या हिम्मत नहीं है।

सहर के लिए अपनी कहानी सार्वजनिक करना सिर्फ व्यक्तिगत अनुभव साझा करना नहीं था। यह उस चुप्पी को तोड़ने की कोशिश भी थी, जो मानसिक बीमारी के आसपास बनी हुई है।

‘लोगों को लगता है कि मानसिक बीमारी छिपाना बेहतर है’

सहर कहती हैं कि मानसिक स्वास्थ्य के मामले में आज भी सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है—लोगों का जज किए जाने का डर।

मानसिक बीमारी को लेकर लोगों में यह धारणा अब भी मौजूद है कि अगर वे अपनी परेशानी के बारे में बताएंगे तो उन्हें कमजोर, असामान्य या अक्षम समझा जाएगा।

सहर इस सोच को चुनौती देती हैं।

उनका कहना है कि किसी व्यक्ति को बिना जाने, केवल उसकी मानसिक या शारीरिक स्थिति देखकर कमजोर मान लेना ही ‘जज करना’ है। समाज ने अपने हिसाब से ‘नॉर्मल’ और ‘अबनॉर्मल’ की परिभाषाएं बनाई हैं, जबकि हर व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है।

उनका संदेश साफ है—मानसिक बीमारी किसी व्यक्ति की पूरी पहचान नहीं है।

‘मैं अकेले बाइक पर निकल सकती हूं, लेकिन अकेले यह लड़ाई नहीं लड़ सकती’

सहर अपनी यात्रा को अकेले की उपलब्धि नहीं मानतीं। वह इस बात पर जोर देती हैं कि मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे व्यक्ति के लिए डॉक्टर, therapist, परिवार और दोस्तों का support system बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।

वह अपने माता-पिता को अपना सबसे बड़ा pillar बताती हैं।

उनका कहना है कि उन्हें इलाज और सहयोग मिल सका, इसलिए वह अपनी जिंदगी को संभालने की स्थिति में पहुंचीं। लेकिन हर व्यक्ति को ऐसा support system नहीं मिल पाता।

यही असमानता उनकी चिंता का एक बड़ा कारण है।

मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, इलाज की लागत, विशेषज्ञों की उपलब्धता और जागरूकता—इन सभी को वह एक साथ देखने की जरूरत बताती हैं।

राहुल गांधी और सोनिया गांधी से भी की मानसिक स्वास्थ्य नीति मजबूत करने की अपील

यात्रा शुरू करने से पहले सहर ने राजनीतिक स्तर पर भी मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे को उठाने की कोशिश की।

वह बताती हैं कि उन्होंने राहुल गांधी, सोनिया गांधी और अन्य राजनीतिक प्रतिनिधियों से मुलाकात की और मानसिक स्वास्थ्य नीति को मजबूत करने की जरूरत पर बात की।

उनकी मुख्य चिंता है कि देश में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और उपचार की उपलब्धता जरूरत के मुकाबले बेहद कम है। उनका कहना है कि इलाज महंगा होने और सेवाओं की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग मदद तक नहीं पहुंच पाते।

राहुल गांधी के साथ बातचीत को लेकर सहर बताती हैं कि उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य उपचार और awareness को बढ़ाने की जरूरत पर चर्चा की। उनके मुताबिक, इस मुद्दे पर राहुल गांधी की प्रतिक्रिया सकारात्मक थी, हालांकि दोनों के बीच कुछ दूसरे मुद्दों पर विचारों में अंतर भी था।

सहर के लिए ‘Giving up is not an option’

सहर की बाइक यात्रा का संदेश सिर्फ मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोगों तक सीमित नहीं है। वह पूरे समाज से मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अपनी सोच बदलने की अपील करती हैं।

उनका कहना है कि अगर सड़क पर लोग उन्हें बाइक पर गुजरते हुए देखें तो वे इस अभियान का हिस्सा बनें और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े stigma को तोड़ने में मदद करें।

उनका संदेश है कि जिंदगी बेहद कीमती है और मुश्किल परिस्थितियों में भी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।

“Giving up is not an option”—सहर के अभियान का यही मूल संदेश है।

दिल्ली से कन्याकुमारी तक हजारों किलोमीटर की यह यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मानसिक स्वास्थ्य को किसी बंद कमरे, अस्पताल या व्यक्तिगत समस्या के रूप में देखने के बजाय उसे सार्वजनिक संवाद का विषय बनाने की कोशिश है।

सहर ने अपनी निजी लड़ाई को सार्वजनिक अभियान में बदलने का फैसला किया है। अब उनकी बाइक पर सिर्फ एक यात्री नहीं, बल्कि एक संदेश भी सफर करेगा—मानसिक स्वास्थ्य पर चुप्पी नहीं, बातचीत जरूरी है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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