August 23, 2026 7:55 pm
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Social media पर योगी लगा रहे शिकंजा और बिहार में हो रहा सौदा!

बिहार में सरकारी योजनाओं पर वीडियो बनाने वाले क्रिएटर्स को व्यूज के आधार पर भुगतान मिलेगा। यूपी में स्कूलों में YouTubers पर रोक के बीच Gen Alpha के प्रदर्शन ने उठाए बड़े सवाल।

सोशल मीडिया साधने के दो मॉडल: बिहार में सरकार की तारीफ के बदले पैसा, यूपी में स्कूलों के दरवाजे बंद

बिहार में सरकारी योजनाओं पर वीडियो बनाने वाले सोशल मीडिया क्रिएटर्स को व्यूज के आधार पर भुगतान का फैसला, वहीं उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों में बिना अनुमति YouTubers और बाहरी लोगों की एंट्री पर रोक। क्या Gen Z के बाद Gen Alpha की डिजिटल ताकत ने सरकारों को सोशल मीडिया को लेकर नई रणनीति बनाने पर मजबूर कर दिया है?

सोशल मीडिया अब सिर्फ मनोरंजन या निजी अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रह गया है। यह सरकारों की नीतियों, सरकारी स्कूलों और योजनाओं की जमीनी हकीकत सामने लाने का बड़ा मंच बन चुका है। उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों को लेकर बच्चों के लगातार सामने आ रहे वीडियो और विरोध-प्रदर्शन तथा बिहार में सरकारी योजनाओं के प्रचार के लिए सोशल मीडिया क्रिएटर्स को भुगतान की नई व्यवस्था—दोनों घटनाएं इसी बदलती तस्वीर की ओर इशारा करती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि दोनों राज्यों में सोशल मीडिया को लेकर रास्ते बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं। बिहार ने क्रिएटर्स को सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों पर कंटेंट बनाने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देने का रास्ता चुना है, जबकि उत्तर प्रदेश में कई जिलों में स्कूल परिसरों में बिना अनुमति बाहरी लोगों, YouTubers और सोशल मीडिया क्रिएटर्स के प्रवेश तथा फोटो-वीडियो बनाने पर रोक लगाई जा रही है।

बिहार मॉडल: सरकारी योजनाओं पर वीडियो, 1 लाख व्यूज पर 10 हजार रुपये

बिहार कैबिनेट ने 19 अगस्त 2026 को सोशल मीडिया से जुड़े नियमों में संशोधन को मंजूरी दी। नए प्रावधानों के तहत सरकार की योजनाओं, कार्यक्रमों और उपलब्धियों पर कंटेंट बनाने वाले सूचीबद्ध यानी empanelled सोशल मीडिया क्रिएटर्स को उनके वीडियो की पहुंच के आधार पर अतिरिक्त भुगतान मिल सकेगा।

मौजूदा जानकारी के मुताबिक, वीडियो के 30 दिन पूरे होने के बाद हर एक लाख व्यूज पर 10 हजार रुपये का भुगतान किया जा सकता है। एक वीडियो पर अधिकतम भुगतान एक लाख रुपये तक सीमित रहेगा यानी 10 लाख व्यूज तक इस दर से भुगतान की व्यवस्था होगी। भुगतान के लिए क्रिएटर का सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के साथ empanelled होना और निर्धारित शर्तों तथा सत्यापन प्रक्रिया को पूरा करना जरूरी होगा।

यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। इसे सीधे-सीधे “हर वायरल वीडियो पर सरकार 10 हजार रुपये देगी” कहना सही नहीं होगा। यह व्यवस्था पात्र और सूचीबद्ध क्रिएटर्स तथा निर्धारित सरकारी शर्तों के तहत लागू होगी। विस्तृत दिशा-निर्देशों के लिए सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की अधिसूचना का इंतजार है।

फिर भी सवाल बड़ा है—जब सरकार किसी ऐसी सामग्री के लिए पैसा देती है जिसमें उसकी योजनाओं और उपलब्धियों का प्रचार किया जाना है, तो क्या इससे सरकारी प्रचार और स्वतंत्र सोशल मीडिया कंटेंट के बीच की सीमा धुंधली नहीं होगी?

यही वह सवाल है जिसे लेकर इस नीति पर बहस जरूरी है।

क्या सोशल मीडिया का जवाब सरकारी PR से दिया जाएगा?

सोशल मीडिया पर सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब यह नहीं है कि वे अपना संदेश लोगों तक कैसे पहुंचाएं। चुनौती यह है कि वे उस कंटेंट का सामना कैसे करें जो सरकारी दावों और जमीन पर मौजूद वास्तविकता के बीच अंतर दिखाता है।

बिहार की नीति का आधिकारिक उद्देश्य सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों को सोशल मीडिया के जरिए ज्यादा लोगों तक पहुंचाना है। लेकिन आलोचनात्मक नजर से देखें तो व्यूज से जुड़े भुगतान का मॉडल यह सवाल जरूर पैदा करता है कि क्या सरकारी धन से सरकार के पक्ष में डिजिटल नैरेटिव को मजबूत करने की कोशिश हो रही है।

इसे “रिश्वत” कहना एक राजनीतिक टिप्पणी हो सकती है; तथ्यात्मक रूप से यह फिलहाल सरकार द्वारा घोषित performance-linked incentive है। लेकिन लोकतंत्र में यह पूछना पूरी तरह जायज है कि ऐसे भुगतान की पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी, कंटेंट की स्वतंत्रता कितनी होगी और क्या सरकार की आलोचना करने वाला क्रिएटर भी उसी व्यवस्था में समान अवसर पाएगा?

यही वे सवाल हैं जिनके जवाब इस नीति की विश्वसनीयता तय करेंगे।

दूसरी तरफ यूपी: सरकारी स्कूलों में YouTubers की ‘नो एंट्री’

उत्तर प्रदेश में तस्वीर बिल्कुल अलग है।

जुलाई के अंत से लेकर अगस्त में कई जिलों में बेसिक शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूलों में बिना अनुमति बाहरी लोगों, YouTubers, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और कंटेंट क्रिएटर्स के प्रवेश तथा फोटो-वीडियो बनाने पर रोक से जुड़े आदेश जारी किए हैं।

आगरा में 2,400 से अधिक सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में बिना अनुमति YouTubers और अन्य बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगाई गई और परिसर में फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी के लिए पूर्व लिखित अनुमति की व्यवस्था की गई। विभाग ने इसका कारण पढ़ाई में व्यवधान और छात्रों की सुरक्षा बताया।

आजमगढ़ में भी जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने बिना अनुमति YouTubers और बाहरी लोगों के स्कूलों में प्रवेश पर रोक लगाई। अयोध्या में भी परिषदीय विद्यालयों में बिना अनुमति बाहरी लोगों के प्रवेश और फोटो-वीडियो बनाने पर प्रतिबंध की खबर सामने आई।

सरकारों का तर्क है कि स्कूल पढ़ाई की जगह हैं और बाहरी लोगों की अनियंत्रित मौजूदगी से बच्चों की पढ़ाई, सुरक्षा और स्कूल के वातावरण पर असर पड़ सकता है। यह तर्क अपने आप में गंभीर है और बच्चों की निजता और सुरक्षा का सवाल भी महत्वपूर्ण है।

लेकिन दूसरी तरफ सवाल यह है कि अगर किसी सरकारी स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, खाना खराब है, पानी नहीं है, शौचालय खराब हैं या स्कूल तक पहुंचने वाली सड़क बदहाल है, तो उन समस्याओं को सामने लाने का रास्ता क्या होगा?

Gen Alpha अब शिकायत नहीं, सवाल कर रही है

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ हफ्तों में सरकारी स्कूलों के बच्चों के विरोध-प्रदर्शनों की एक श्रृंखला सामने आई है।

लखनऊ में सरकारी स्कूल की छात्राओं ने शिक्षकों की कमी और स्कूल की सुविधाओं को लेकर प्रदर्शन किया। कई छात्रों ने सड़क पर उतरकर अपनी मांगें उठाईं।

कन्नौज में PM Shri Composite School के छात्रों ने कक्षाओं का बहिष्कार कर प्रभारी प्रधानाचार्य के खिलाफ प्रदर्शन किया। छात्रों और अभिभावकों ने कई गंभीर आरोप लगाए, जिनके बाद शिक्षा विभाग और पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।

महोबा में तो Gen Alpha के स्कूली बच्चे स्कूल तक पहुंचने वाले खराब रास्ते और जलभराव के खिलाफ सड़क पर उतर गए। 19 अगस्त को छात्रों ने झांसी-मिर्जापुर हाईवे को करीब तीन घंटे तक जाम किया। अधिकारियों के आश्वासन के बाद प्रदर्शन खत्म हुआ।

यानी ये बच्चे सिर्फ सोशल मीडिया पर वीडियो बनाने वाली पीढ़ी नहीं हैं। वे खुद अपनी समस्याओं को रिकॉर्ड कर रहे हैं, साझा कर रहे हैं और जरूरत पड़ने पर सड़क पर भी उतर रहे हैं।

समस्या वीडियो नहीं, समस्या वीडियो में दिखाई देने वाली हकीकत तो नहीं?

यहीं पर पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है।

अगर किसी सरकारी स्कूल का रास्ता खराब है, बच्चे बारिश में कीचड़ से होकर स्कूल पहुंचते हैं, शिक्षक कम हैं, खाने या पानी की शिकायत है या स्कूल की दूसरी बुनियादी सुविधाएं खराब हैं, तो उस समस्या का वीडियो बन जाना समस्या पैदा नहीं करता।

वह वीडियो समस्या को दिखाता है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने भी छात्रों के लगातार प्रदर्शनों के बाद अधिकारियों को सोशल मीडिया पर आने वाली शिकायतों को ट्रैक करने, उनका सत्यापन करने और वास्तविक शिकायतों पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। शिक्षा विभाग ने करीब 40 हजार बेसिक और माध्यमिक स्कूलों में पानी, शौचालय, बिजली, साफ-सफाई, भोजन और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की जांच के लिए 14-सूत्रीय चेकलिस्ट भी जारी की है।

यह कदम बताता है कि सोशल मीडिया को पूरी तरह नजरअंदाज करना अब संभव नहीं है।

Gen Z के बाद Gen Alpha का डिजिटल दबाव

Gen Z ने सोशल मीडिया को राजनीतिक और सामाजिक सवालों के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। अब उससे छोटी Gen Alpha पीढ़ी भी उसी डिजिटल वातावरण में बड़ी हो रही है।

इन बच्चों के पास मोबाइल कैमरा है, सोशल मीडिया है और अपनी बात सीधे जनता तक पहुंचाने की क्षमता है।

यही बदलाव सत्ता के लिए चुनौती भी है और अवसर भी।

चुनौती इसलिए कि किसी स्कूल की स्थानीय समस्या अब सिर्फ स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहती। एक वीडियो कुछ घंटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। अवसर इसलिए कि वही सोशल मीडिया सरकार को वास्तविक समय में शिकायतों की जानकारी भी दे सकता है।

इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि वीडियो बनने दिया जाए या नहीं।

सवाल यह होना चाहिए कि वीडियो में दिखाई जा रही समस्या को ठीक किया गया या नहीं।

बिहार और यूपी के दो मॉडल, लेकिन सवाल एक

एक तरफ बिहार का मॉडल है—सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों पर सोशल मीडिया कंटेंट बनाने वाले सूचीबद्ध क्रिएटर्स को व्यूज के आधार पर आर्थिक प्रोत्साहन।

दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के कई जिलों में मॉडल है—सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों और YouTubers की अनधिकृत एंट्री तथा फोटो-वीडियो पर रोक।

दोनों रास्ते अलग हैं, लेकिन दोनों के पीछे सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत को लेकर सरकारों की चिंता साफ दिखाई देती है।

हालांकि यह कहना कि इन दोनों नीतियों के पीछे किसी एक राजनीतिक संगठन या “आईटी सेल” की कोई साझा योजना है, उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं के आधार पर अभी साबित नहीं किया जा सकता। इसे राजनीतिक आरोप या विश्लेषण के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

लेकिन एक बात साफ है—सोशल मीडिया को अब सत्ता नजरअंदाज नहीं कर सकती।

और अगर Gen Alpha के बच्चे अपने स्कूल की बदहाली का वीडियो बनाकर पूछ रहे हैं कि “हमारे स्कूल में यह सुविधा क्यों नहीं है?”, तो सबसे मजबूत जवाब कैमरा बंद करवाना नहीं, बल्कि उस सवाल का जवाब देना होगा।

क्योंकि वीडियो को रोकने से सड़क के गड्ढे नहीं भरेंगे।

स्कूल में शिक्षक नहीं आएंगे।

खाने की गुणवत्ता अपने आप ठीक नहीं होगी।

और बच्चों की शिकायत भी खत्म नहीं होगी।

चिंगारी को दबाने से बेहतर है कि उस समस्या को खत्म किया जाए, जिसकी वजह से चिंगारी पैदा हुई है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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