जंतर-मंतर छात्र आंदोलन: आखिर PM मोदी का ट्वीट छात्रों को क्यों नहीं आया पसंद?
करीब एक महीने से अधिक समय से दिल्ली के जंतर-मंतर पर हजारों छात्र अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस मुद्दे को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी। लेकिन जिस संदेश से सरकार आंदोलन शांत होने की उम्मीद कर रही थी, वही संदेश छात्रों और विपक्ष के निशाने पर आ गया।
विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री ने आंदोलन की असली मांगों को समझने के बजाय केवल सामान्य बयान देकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की है।
34 दिन बाद आई प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया
आंदोलन शुरू होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई दिनों तक इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा। लगभग 34 दिन बाद उन्होंने X पर लिखा कि सरकार पेपर लीक के मामलों को गंभीरता से ले रही है और दोषियों के खिलाफ तेज़ कार्रवाई तथा फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमे चलाने की दिशा में काम करेगी।
लेकिन आंदोलन कर रहे छात्रों का कहना है कि उनकी मांग सिर्फ तेज़ मुकदमे नहीं हैं।
छात्र आखिर क्या मांग रहे हैं?
जंतर-मंतर पर बैठे प्रदर्शनकारी लगातार तीन प्रमुख मांगें उठा रहे हैं—
- शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा।
- परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय करना।
- छात्रों का सरकार पर टूटा भरोसा वापस लाने के लिए ठोस कार्रवाई।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक इन मुद्दों पर सरकार स्पष्ट निर्णय नहीं लेती, आंदोलन जारी रहेगा।
प्रियंका गांधी ने संसद में सरकार को घेरा
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने संसद में सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देशभर के छात्र सड़कों पर हैं तो प्रधानमंत्री सदन में मौजूद क्यों नहीं हैं।
प्रियंका गांधी ने कहा कि सरकार छात्रों की वास्तविक चिंताओं को सुनने के बजाय उनसे दूरी बनाए हुए है और यही वजह है कि संसद भी इस मुद्दे पर लगातार बाधित हो रही है।
राहुल गांधी ने उठाया जवाबदेही का मुद्दा
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पहले भी पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था पर सरकार से जवाब मांग चुके हैं।
विपक्ष का कहना है कि केवल माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई की बात करना पर्याप्त नहीं है। सरकार को यह भी बताना चाहिए कि बार-बार परीक्षा प्रणाली क्यों विफल हो रही है और इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा।
पेपर लीक पर PM मोदी के पुराने बयान फिर चर्चा में
विपक्ष ने प्रधानमंत्री के पुराने भाषणों का भी हवाला दिया है।
राजस्थान और संसद सहित कई मंचों से प्रधानमंत्री पहले भी पेपर लीक माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिला चुके हैं।
इनमें प्रमुख बयान शामिल हैं—
- अक्टूबर 2023
- नवंबर 2023
- फरवरी 2024
- अप्रैल 2024
- जुलाई 2024
- दिसंबर 2024
- जुलाई 2026
आलोचकों का कहना है कि बार-बार आश्वासन देने के बावजूद परीक्षा विवाद खत्म नहीं हुए।
CBI जांच पर भी उठे सवाल
विपक्ष ने उस रिपोर्ट का भी हवाला दिया जिसमें NEET पेपर लीक मामले के आरोपी बताए गए संजीव मुखिया को जमानत मिलने की बात कही गई।
विपक्ष का आरोप है कि जांच एजेंसियां समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकीं, जबकि सरकार लगातार सख्त कार्रवाई का दावा करती रही है।
हालांकि सरकार और जांच एजेंसियों ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है।
क्या आंदोलन अब पूरी तरह राजनीतिक हो गया है?
जंतर-मंतर का आंदोलन अब केवल परीक्षा सुधार का मुद्दा नहीं रह गया है।
यह संसद से लेकर सड़क तक बड़ा राजनीतिक संघर्ष बन चुका है। विपक्ष सरकार पर छात्रों की आवाज़ दबाने का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई जारी है।
प्रदर्शन के दौरान हिंसा के आरोप
आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए हैं जिनमें प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई और कुछ बाहरी समूहों की मौजूदगी पर सवाल उठाए हैं।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित एजेंसियों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
सबसे बड़ा सवाल—क्या सरकार और छात्रों के बीच भरोसा खत्म हो चुका है?
जंतर-मंतर आंदोलन का सबसे बड़ा संदेश यही माना जा रहा है कि बड़ी संख्या में युवा परीक्षा प्रणाली और सरकारी आश्वासनों पर भरोसा खो चुके हैं।
सरकार जहां कानूनी कार्रवाई की बात कर रही है, वहीं छात्र जवाबदेही और राजनीतिक जिम्मेदारी तय करने की मांग पर अड़े हुए हैं।
यही कारण है कि प्रधानमंत्री का हालिया संदेश आंदोलन को शांत करने के बजाय नई राजनीतिक बहस का विषय बन गया है।
निष्कर्ष
जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन अब केवल पेपर लीक का मुद्दा नहीं रह गया है। यह युवाओं के भरोसे, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और राजनीतिक जवाबदेही का राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है।
अब देखने वाली बात होगी कि सरकार केवल आश्वासन देती है या छात्रों की मुख्य मांगों पर भी कोई ठोस फैसला लेती है।
