मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बना छात्रों का गुस्सा
“मोदी जी, युवाओं का यह आक्रोश अब आपसे संभाले नहीं संभलेगा।”
दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी छात्रों की आवाज अब सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं रह गई है। बिहार से लेकर मिजोरम, दक्षिण भारत से लेकर विदेशों तक भारतीय छात्र और युवा सड़कों पर उतर रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं और प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन अब एक व्यापक राजनीतिक आंदोलन का रूप लेता दिखाई दे रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ छात्र आंदोलन है या फिर देश की Gen Z का वह असंतोष, जो अब सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को चुनौती देता नजर आ रहा है?
दिल्ली में ‘पैनिक मोड’?
जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व स्तर पर बढ़ा दी गई। कई मेट्रो स्टेशन अस्थायी रूप से बंद कर दिए गए। बड़ी संख्या में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की गई। प्रदर्शन स्थल के आसपास पुलिस का भारी बंदोबस्त किया गया।
बेबाक भाषा के विश्लेषण के अनुसार, सरकार ने जिस स्तर पर सुरक्षा इंतजाम किए, उससे यह संदेश गया कि आंदोलन को लेकर प्रशासन गंभीर और सतर्क है। हालांकि आंदोलनकारी इसे सरकार की बेचैनी के रूप में देख रहे हैं।
पटना से दिल्ली तक एक ही मांग
दिल्ली के साथ-साथ बिहार की राजधानी पटना में भी हजारों छात्र सड़कों पर उतरे। छात्रों की प्रमुख मांग है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार सामने आ रहे कथित पेपर लीक और अनियमितताओं की जिम्मेदारी तय की जाए।
आंदोलन के दौरान सबसे अधिक जिस मांग ने जोर पकड़ा है, वह है केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग।
राहुल गांधी ने भी खोला मोर्चा
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर छात्रों का समर्थन किया और कहा कि जब तक छात्रों को न्याय नहीं मिलता, तब तक यह मुद्दा संसद और देश की राजनीति के केंद्र में रहेगा।
राहुल गांधी ने कथित पेपर लीक, छात्रों की आत्महत्याओं और आंदोलन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा। विपक्ष लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से छात्रों को संबोधित करने और पूरे मामले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग कर रहा है।
आंदोलन की तीन बड़ी मांगें
इस आंदोलन से तीन प्रमुख मांगें निकलकर सामने आ रही हैं—
- केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा।
- कथित पेपर लीक और छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच तथा जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा छात्रों को संबोधित कर उनकी चिंताओं पर जवाब देना और विपक्ष के अनुसार नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करना।
पुलिस कार्रवाई ने और भड़काया गुस्सा?
प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा लाठीचार्ज और बल प्रयोग के आरोपों ने आंदोलन को और तेज कर दिया है। सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए, जिनमें प्रदर्शनकारियों के साथ कथित मारपीट और धक्का-मुक्की दिखाई देने का दावा किया गया।
आंदोलन से जुड़े कई छात्र संगठनों का आरोप है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन को बलपूर्वक रोकने की कोशिश की गई। वहीं पुलिस और प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
‘Gen Z Revolution’ क्यों कहा जा रहा है?
इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत इसकी व्यापकता है। यह किसी एक विश्वविद्यालय या एक परीक्षा तक सीमित नहीं है।
सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले लाखों छात्र, बेरोजगारी, भर्ती में देरी, कथित पेपर लीक और भविष्य की अनिश्चितता जैसे मुद्दों को जोड़कर इस आंदोलन को अपनी आवाज बना रहे हैं।
यही वजह है कि इसे सोशल मीडिया पर कई लोग ‘Gen Z Revolution’ कह रहे हैं।
राजनीति के केंद्र में अब मोदी सरकार
आंदोलन की शुरुआत भले ही परीक्षा प्रणाली और शिक्षा मंत्रालय से जुड़े सवालों से हुई हो, लेकिन अब इसका राजनीतिक केंद्र बदलता नजर आ रहा है।
प्रदर्शन स्थलों पर लगाए जा रहे नारे, विपक्ष के हमले और सोशल मीडिया पर चल रही बहस इस बात की ओर संकेत कर रहे हैं कि अब आंदोलन का निशाना सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार बनती जा रही है।
सरकार के सामने अब चुनौती सिर्फ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नहीं, बल्कि उस पीढ़ी का भरोसा जीतने की भी है जो अपने भविष्य को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित है।
निष्कर्ष
जंतर-मंतर का यह आंदोलन सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं रह गया है। यह युवाओं की उम्मीदों, रोजगार, शिक्षा व्यवस्था और सरकारी जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस बन चुका है।
अब देखना यह होगा कि सरकार संवाद का रास्ता चुनती है या यह आंदोलन आने वाले दिनों में और व्यापक राजनीतिक स्वरूप ग्रहण करता है।
