March 2, 2026 10:31 am
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यूनिटी से ही जेएनयू में फिर जीता लेफ्ट

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव 2025 में लेफ्ट यूनिटी ने सभी प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की। अदिति, गोपिका, सुनील यादव और दानिश अली की जीत ने दिखाया कि जेएनयू आज भी विचार और प्रतिरोध की ज़मीन है।

लहराया लाल झंडा — ABVP का सूपड़ा साफ

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में एक बार फिर लेफ्ट यूनिटी ने अपनी वैचारिक ताक़त और छात्र राजनीति की एकता का परिचय दिया है। इस बार के छात्रसंघ चुनाव में सभी प्रमुख पदों—प्रेसिडेंट, वाइस प्रेसिडेंट, जनरल सेक्रेटरी और जॉइंट सेक्रेटरी—पर लेफ्ट यूनिटी पैनल के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है।

जेएनयू में जीत ज्यादा कठिन भाजपा के लिए

वीडियो में एक छात्र नेता कहते हैं —

“मोदी जी के लिए बिहार जितना जीतना मुश्किल है, उससे ज़्यादा जेएनयू को जीतना मुश्किल है।”

यह बयान उस माहौल को समझाता है जिसमें जेएनयू आज भी विचारधारा, बहस और लोकतांत्रिक मूल्यों की आखिरी मजबूत ज़मीन बना हुआ है।

कांटे की टक्कर, लाल झंडे की वापसी

इस चुनाव में अदिति (प्रेसिडेंट), गोपिका, सुनील यादव और दानिश अली जैसे उम्मीदवारों ने जबरदस्त संघर्ष के बाद जीत हासिल की। कैंपस में “जेएनयू लाल था, लाल है और लाल रहेगा” के नारे गूंज उठे।

इस बार की टक्कर बेहद कांटे की थी, लेकिन अंततः बहुमत ने विचारधारा को चुना। लेफ्ट यूनिटी के नेताओं ने कहा कि यह जीत केवल सीटों की नहीं, बल्कि विचारों की जीत है — उस विचार की जो शिक्षा को अधिकार मानता है, सत्ता का औजार नहीं।

विचारधारा के आधार पर चली लड़ाई

लेफ्ट यूनिटी का कहना है कि हर वोट विचारधारा के आधार पर पड़ा। भाजपा समर्थित ABVP ने तमाम सरकारी समर्थन और संस्थागत ताकत के बावजूद इस बार भी जेएनयू को नहीं जीत पाया।

बीते ग्यारह सालों में केंद्र सरकार ने जेएनयू की संरचना बदलने से लेकर ‘अपने मनमाफिक’ वाइस चांसलर और प्रशासक नियुक्त करने तक, कई कोशिशें कीं — लेकिन जेएनयू के छात्रों ने हर बार अपने प्रतिरोध और राजनीतिक चेतना से इन प्रयासों को जवाब दिया।

जेएनयू और बिहार चुनाव का समानांतर

दिलचस्प है कि यह नतीजे बिहार चुनाव के पहले चरण के मतदान के दिन आए। वीडियो में कई छात्रों ने कहा कि जिस तरह बिहार में जनमत बदल रहा है, उसी तरह जेएनयू की यह जीत भी सत्ता के खिलाफ एक वैचारिक जनादेश है।

“जब जेएनयू में लाल-लाल लहराएगा, तब होश ठिकाने आएगा,”
यह नारा इस चुनाव में केवल जेएनयू के गलियारों में नहीं, बल्कि पूरे देश में छात्र राजनीति के पुनर्जागरण का प्रतीक बन गया।

निष्कर्ष

जेएनयू की यह जीत इस बात का सबूत है कि शिक्षा, तर्क, और विचार की राजनीति को मिटाया नहीं जा सकता। यह उस जेएनयू की जीत है जो सत्ता से सवाल पूछता है, जो संविधान और लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखता है।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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