August 19, 2026 3:54 pm
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शिक्षा का संकट: मोदी सरकार से नहीं संभल पा रहा हाल

UGC NET 2026 के English, Commerce और Sociology पेपर में गड़बड़ी के बाद दोबारा परीक्षा होगी। राजस्थान और लखनऊ में स्कूलों की बदहाली व शिक्षकों की कमी पर भी सवाल उठ रहे हैं।

UGC-NET में गड़बड़ी से लेकर राजस्थान और लखनऊ के स्कूलों तक, सवालों के घेरे में सरकार

UGC-NET के तीन विषयों में दोबारा परीक्षा, राजस्थान में सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और वीडियो पर रोक, लखनऊ में शिक्षकों की कमी को लेकर छात्राओं का प्रदर्शन—देश में शिक्षा व्यवस्था को लेकर बढ़ता असंतोष अब सड़कों पर दिखाई दे रहा है।

शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी शिकायतें अब केवल छात्रों, अभिभावकों या शिक्षकों तक सीमित नहीं रह गई हैं। उच्च शिक्षा की प्रवेश और पात्रता परीक्षाओं से लेकर सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं तक, अलग-अलग राज्यों से सामने आ रही घटनाएं एक बड़े सवाल की ओर इशारा कर रही हैं—क्या शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं का समाधान करने के बजाय सरकारें आलोचना और सवाल उठाने वालों को रोकने की कोशिश कर रही हैं?

UGC-NET: तीन विषयों में फिर होगी परीक्षा

UGC-NET जून 2026 परीक्षा को लेकर छात्रों की शिकायतों के बाद नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने तीन विषयों के लिए दोबारा परीक्षा कराने का फैसला किया है।

NTA ने English, Commerce और Sociology के प्रश्नपत्रों में गंभीर खामियां स्वीकार की हैं। रिपोर्टों के मुताबिक विशेषज्ञ समिति की जांच में प्रश्नों से जुड़ी तथ्यात्मक, भाषाई और अनुवाद संबंधी समस्याएं सामने आईं। कुछ मामलों में प्रश्नों के दोहराव जैसी शिकायतें भी सामने आईं।

UGC-NET जून 2026 की परीक्षा 22 से 30 जून के बीच आयोजित की गई थी। परीक्षा के दौरान ही अभ्यर्थियों ने प्रश्नपत्रों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाए थे।

अब तीन विषयों के अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देनी होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन अभ्यर्थियों ने पहले इन विषयों की परीक्षा दी थी, उनसे दोबारा परीक्षा के लिए अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा।

लेकिन सवाल सिर्फ दोबारा परीक्षा का नहीं है। सवाल यह है कि महीनों तक तैयारी करने वाले छात्रों को ऐसी स्थिति का सामना क्यों करना पड़ा? परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी की जिम्मेदारी तय कैसे होगी और छात्रों के समय तथा मानसिक दबाव की भरपाई कैसे होगी?

राजस्थान: स्कूलों की बदहाली पर सवाल उठे तो प्रवेश पर पाबंदी

शिक्षा व्यवस्था का दूसरा उदाहरण राजस्थान से सामने आया है।

राज्य में सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर अभियान और रिपोर्टिंग के बीच शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूल परिसरों में बाहरी लोगों के प्रवेश को लेकर नए प्रतिबंध लागू किए। रिपोर्टों के अनुसार बिना पूर्व अनुमति स्कूल परिसर में बाहरी लोगों के प्रवेश के साथ-साथ फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, लाइव स्ट्रीमिंग और इंटरव्यू जैसी गतिविधियों पर भी रोक लगाई गई है। यह फैसला ‘School Thik Karo’ अभियान के सामने आने के बाद लिया गया।

यहीं से एक बड़ा सवाल पैदा होता है—अगर किसी सरकारी स्कूल में भवन जर्जर है, शिक्षक कम हैं, पानी या शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है, तो इन समस्याओं को सामने लाने का रास्ता क्या होना चाहिए?

सरकार का पहला जवाब स्कूल की स्थिति सुधारना होना चाहिए, न कि उस स्थिति को रिकॉर्ड करने या उसके बारे में सवाल पूछने की प्रक्रिया को कठिन बनाना।

सरकारी स्कूल जनता के पैसे से चलते हैं। इसलिए उनकी स्थिति पर सवाल पूछना और उनकी व्यवस्थाओं की पड़ताल करना लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा होना चाहिए।

विज्ञापन बनाम स्कूलों की बुनियादी जरूरतें

शिक्षा पर बहस का एक बड़ा हिस्सा सरकारी खर्च और प्राथमिकताओं से जुड़ा है।

जब एक ओर सरकारी स्कूलों में शिक्षक, भवन, पानी, शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायतें सामने आती हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारों के प्रचार और विज्ञापन पर होने वाले खर्च को लेकर भी सवाल उठते हैं।

सवाल यह होना चाहिए कि शिक्षा के लिए उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल सबसे प्रभावी तरीके से कैसे हो रहा है।

क्या प्राथमिकता सरकारी स्कूलों की इमारतें ठीक करने, शिक्षकों के रिक्त पद भरने और बच्चों को सुरक्षित तथा सम्मानजनक वातावरण देने की होनी चाहिए या सरकार की उपलब्धियों के प्रचार की?

यह बहस किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है।

निर्मला सीतारमण से शिक्षा बजट पर भी सवाल

शिक्षा की स्थिति पर राष्ट्रीय स्तर की बहस में केंद्रीय बजट और सरकारी खर्च भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल के एक इंटरव्यू में शिक्षा से जुड़ी समस्याओं और सरकार की नीतियों पर बात की है। लेकिन इस बहस में एक बुनियादी सवाल को केंद्र में रखना जरूरी है—सरकारी स्कूलों और शिक्षा व्यवस्था को पर्याप्त संसाधन क्यों नहीं मिल रहे हैं?

यदि किसी सरकारी स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, भवन खराब है या बच्चों को मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल रही हैं, तो केवल प्रशासनिक आदेश से समस्या हल नहीं होगी। उसके लिए पैसा, मानव संसाधन और लगातार निगरानी की जरूरत होगी।

इसलिए शिक्षा व्यवस्था की चर्चा करते समय केवल छात्रों की शिकायतों या शिक्षकों की उपलब्धता तक सीमित रहने के बजाय शिक्षा पर सरकारी खर्च और उसके वितरण पर भी सवाल होना चाहिए।

लखनऊ में सड़क पर उतरीं छात्राएं

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सामने आया दृश्य इस पूरे संकट को और गंभीर बनाता है।

लखनऊ के जय प्रकाश नारायण सर्वोदय विद्यालय की छात्राओं ने शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं को लेकर प्रदर्शन किया। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 250 छात्राओं ने लगभग 2.5 किलोमीटर मार्च किया और सड़क पर पहुंचकर अपनी मांगें उठाईं।

छात्राओं की शिकायतें बेहद बुनियादी हैं—उन्हें शिक्षक चाहिए, बेहतर स्कूल चाहिए और पढ़ाई के लिए जरूरी सुविधाएं चाहिए।

यह महज किसी स्कूल का स्थानीय विवाद नहीं माना जा सकता। जब बच्चे और छात्राएं अपनी पढ़ाई के अधिकार के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर होते हैं, तो यह प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी होनी चाहिए।

उनका सवाल सीधा है: अगर स्कूल में शिक्षक और जरूरी सुविधाएं नहीं होंगी, तो वे पढ़ेंगे कैसे?

‘हमें स्कूल चाहिए, शिक्षक चाहिए’

लखनऊ की छात्राओं का प्रदर्शन उस बदलते माहौल की ओर भी संकेत करता है जिसमें नई पीढ़ी अपनी शिक्षा और अधिकारों को लेकर सवाल पूछ रही है।

यह केवल Gen Z की बात नहीं है। स्कूलों में पढ़ने वाले छोटे बच्चे और किशोर भी अब अपनी समस्याओं को लेकर सार्वजनिक रूप से आवाज उठा रहे हैं।

आज सवाल जाति, धर्म या राजनीतिक पहचान से पहले शिक्षा का है।

हमें स्कूल चाहिए।
हमें शिक्षक चाहिए।
हमें पढ़ाई का अधिकार चाहिए।

यही मांग राजस्थान के सरकारी स्कूलों से लेकर लखनऊ की सड़कों तक अलग-अलग रूप में दिखाई दे रही है।

सवाल सरकार से नहीं, व्यवस्था से भी है

UGC-NET की परीक्षा में गड़बड़ी हो या सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और बुनियादी सुविधाओं की कमी—इन सभी घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय शिक्षा व्यवस्था की व्यापक तस्वीर में देखने की जरूरत है।

एक तरफ उच्च शिक्षा के लाखों अभ्यर्थी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों लगाते हैं और परीक्षा व्यवस्था की एक गलती उनके भविष्य को प्रभावित कर सकती है। दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे ऐसे माहौल में शिक्षा हासिल कर रहे हैं जहां कई जगह बुनियादी सुविधाएं तक सवालों के घेरे में हैं।

ऐसे में सरकारों की जिम्मेदारी केवल शिकायतों पर प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि समस्या को स्वीकार करना और उसका स्थायी समाधान करना है।

राजस्थान में स्कूलों में प्रवेश और रिकॉर्डिंग पर प्रतिबंध लगाने से स्कूलों की हालत अपने आप बेहतर नहीं होगी। UGC-NET में दोबारा परीक्षा कराने से छात्रों की परेशानी खत्म नहीं होगी, जब तक परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं की जाती।

और लखनऊ में छात्राओं को सड़क पर उतरने से रोकने का सबसे बेहतर तरीका पुलिस या प्रशासनिक दबाव नहीं, बल्कि उनके स्कूल में शिक्षक और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

शिक्षा का सवाल अब टाला नहीं जा सकता

देश की युवा पीढ़ी शिक्षा को लेकर सवाल पूछ रही है। कहीं UGC-NET के अभ्यर्थी परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं, कहीं राजस्थान में सरकारी स्कूलों की हालत पर अभियान चल रहा है और कहीं लखनऊ में स्कूली छात्राएं शिक्षक और सुविधाओं की मांग को लेकर सड़क पर हैं।

सरकार किसी भी दल की हो, शिक्षा की जवाबदेही से बचना संभव नहीं होना चाहिए।

क्योंकि अंततः सवाल सिर्फ एक परीक्षा, एक स्कूल या एक राज्य का नहीं है।

सवाल है—देश के बच्चों और युवाओं को कैसी शिक्षा व्यवस्था दी जा रही है?

और इस सवाल का जवाब सरकारों को विज्ञापनों में नहीं, स्कूलों और परीक्षा केंद्रों की जमीन पर देना होगा।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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