अदालत में प्रपौत्र की स्वीकारोक्ति से फिर छिड़ी ‘माफीवीर’ बहस
कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान पुणे की विशेष एमपी-एमएलए अदालत में हुई जिरह ने एक बार फिर विनायक दामोदर सावरकर की भूमिका और उनके द्वारा ब्रिटिश सरकार को लिखी गई दया याचिकाओं को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। विडंबना यह है कि राहुल गांधी को कटघरे में खड़ा करने के उद्देश्य से शुरू हुए इस मुकदमे में ऐसी बातें अदालत के रिकॉर्ड का हिस्सा बन गईं, जिनका उल्लेख लंबे समय से इतिहासकारों, राजनीतिक विश्लेषकों और सावरकर के आलोचकों द्वारा किया जाता रहा है।
सावरकर के प्रपौत्र सत्यकी सावरकर ने अदालत में जिरह के दौरान स्वीकार किया कि विनायक दामोदर सावरकर ने ब्रिटिश सरकार को कुल दस बार दया याचिकाएं (Mercy Petitions) भेजी थीं। यह स्वीकारोक्ति ऐसे समय में सामने आई है जब भारतीय राजनीति में सावरकर की विरासत को लेकर तीखी वैचारिक लड़ाई चल रही है।
क्या है पूरा मामला?
यह मुकदमा राहुल गांधी के उस भाषण से जुड़ा है जो उन्होंने 2023 में लंदन में दिया था। उस भाषण में राहुल गांधी ने सावरकर को लेकर कुछ टिप्पणियां की थीं, जिन्हें सत्यकी सावरकर ने मानहानिकारक बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
मामले की सुनवाई पुणे की विशेष एमपी-एमएलए अदालत में विशेष न्यायाधीश अमोल शिंदे की अदालत में चल रही है। इसी सुनवाई के दौरान सत्यकी सावरकर का क्रॉस-एग्जामिनेशन हुआ, जिसमें कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए।
अदालत में क्या स्वीकार किया गया?
जिरह के दौरान सत्यकी सावरकर ने स्वीकार किया कि उनके परदादा विनायक दामोदर सावरकर ने ब्रिटिश सरकार को अनेक दया याचिकाएं लिखी थीं। उन्होंने यह भी माना कि उसी दौर के अन्य क्रांतिकारियों—राजगुरु, अशफाक उल्ला खान और बटुकेश्वर दत्त—ने ऐसी कोई दया याचिका दाखिल नहीं की थी।
गवाही के दौरान सत्यकी ने यह भी कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अंग्रेजी हुकूमत को पत्र लिखकर स्वयं को युद्धबंदी (Prisoners of War) मानने की मांग की थी और किसी भी प्रकार की रियायत या दया की मांग से इनकार कर दिया था।
हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त अंत तक अपने वैचारिक सिद्धांतों पर कायम रहे और उन्होंने ब्रिटिश शासन के साथ कोई समझौता नहीं किया।
दया याचिकाओं पर पुरानी बहस फिर क्यों शुरू हुई?
सावरकर द्वारा लिखी गई दया याचिकाएं कोई नई जानकारी नहीं हैं। ये दस्तावेज दशकों से सार्वजनिक अभिलेखों और ऐतिहासिक शोध का हिस्सा रहे हैं। लेकिन जब यह तथ्य अदालत की कार्यवाही में स्वयं उनके परिवार के सदस्य द्वारा स्वीकार किया जाता है, तो इसका राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व बढ़ जाता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भाजपा लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि सावरकर द्वारा लिखी गई दया याचिकाएं एक रणनीतिक राजनीतिक कदम थीं, जिनका उद्देश्य जेल से बाहर आकर स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाना था। सत्यकी सावरकर ने भी अदालत में इसी तर्क को दोहराते हुए कहा कि उस समय दया याचिका दाखिल करना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया थी।
लेकिन आलोचकों का सवाल यह है कि यदि दया याचिकाएं केवल रणनीतिक थीं, तो रिहाई के बाद सावरकर ने स्वतंत्रता आंदोलन में क्या भूमिका निभाई? इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का एक वर्ग यह तर्क देता रहा है कि रिहाई के बाद सावरकर का राजनीतिक फोकस ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष से हटकर हिंदुत्व की वैचारिक राजनीति पर केंद्रित हो गया था।
इतिहास बनाम राजनीति
सावरकर भारतीय राजनीति के सबसे विवादित ऐतिहासिक व्यक्तित्वों में से एक हैं। एक पक्ष उन्हें महान क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी विचारक मानता है, जबकि दूसरा पक्ष उनकी दया याचिकाओं, हिंदुत्व की अवधारणा और ब्रिटिश शासन के प्रति बाद के रुख को लेकर गंभीर सवाल उठाता है।
यही कारण है कि सावरकर का नाम आते ही बहस इतिहास से निकलकर सीधे समकालीन राजनीति में प्रवेश कर जाती है। राहुल गांधी भी कई बार सार्वजनिक मंचों से सावरकर को “माफीवीर” कह चुके हैं, जबकि भाजपा और संघ परिवार इसे स्वतंत्रता सेनानी का अपमान बताते हैं।
अदालत की अगली सुनवाई पर नजर
राहुल गांधी के खिलाफ चल रहे इस मानहानि मामले की सुनवाई अभी जारी है। अदालत में हुई ताजा गवाही ने बहस को एक नया मोड़ दे दिया है और आने वाले दिनों में इस मामले से जुड़े और भी तथ्य सामने आ सकते हैं।
मामले की अगली सुनवाई 1 जुलाई को निर्धारित है। राजनीतिक हलकों और इतिहास में रुचि रखने वालों की नजर अब इस पर टिकी है कि आगे की जिरह में और कौन-सी जानकारियां अदालत के रिकॉर्ड का हिस्सा बनती हैं।
फिलहाल इतना तय है कि राहुल गांधी को घेरने के लिए शुरू हुई इस कानूनी लड़ाई ने एक बार फिर सावरकर की विरासत, उनकी दया याचिकाओं और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका पर देशव्यापी बहस को जीवित कर दिया है।
