June 18, 2026 1:16 am
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स्टैनफोर्ड में सुंदर पिचाई का विरोध क्यों?

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएशन समारोह में Google CEO सुंदर पिचाई का छात्रों ने विरोध किया। गाज़ा युद्ध, फ़िलिस्तीन समर्थन और गूगल-इज़राइल संबंधों पर उठे सवालों की पड़ताल।

गूगल, गाज़ा और युवाओं के बढ़ते प्रतिरोध की कहानी

अमेरिका की प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में इन दिनों फ़िलिस्तीन के समर्थन में उठ रही आवाज़ें केवल छात्र आंदोलनों तक सीमित नहीं हैं। ये विरोध अब उन वैश्विक कंपनियों तक भी पहुँच रहे हैं जिन पर इज़राइल की सैन्य नीतियों को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं। इसी क्रम में अमेरिका की प्रतिष्ठित Stanford University के एक स्नातक समारोह में Sundar Pichai को जिस तरह के विरोध का सामना करना पड़ा, उसने दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा।

यह विरोध केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं था। यह उस कॉर्पोरेट गठजोड़ के खिलाफ था जिसे दुनिया भर के अनेक छात्र और मानवाधिकार कार्यकर्ता गाज़ा में जारी तबाही के संदर्भ में देख रहे हैं।

मंच पर सुंदर पिचाई, दर्शक दीर्घा में विरोध

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के ग्रेजुएशन समारोह में जब गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुंदर पिचाई छात्रों को संबोधित करने के लिए मंच पर पहुंचे, तब कई छात्रों ने “फ्री, फ्री फिलिस्तीन” के नारे लगाने शुरू कर दिए।

कई छात्र फ़िलिस्तीनी झंडे लेकर समारोह स्थल से बाहर निकल गए। यह विरोध योजनाबद्ध था और इसका उद्देश्य विश्वविद्यालय प्रशासन, गूगल तथा अन्य बड़ी तकनीकी कंपनियों को यह संदेश देना था कि युवा पीढ़ी गाज़ा में हो रही घटनाओं पर चुप रहने को तैयार नहीं है।

समारोह जैसे औपचारिक और उत्सवपूर्ण अवसर पर इस प्रकार का विरोध यह दर्शाता है कि फ़िलिस्तीन का मुद्दा छात्रों के लिए केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी और मानवाधिकारों का प्रश्न बन चुका है।

गूगल क्यों है छात्रों के निशाने पर?

पिछले कुछ वर्षों में गूगल और इज़राइली सरकार के बीच हुए “प्रोजेक्ट निम्बस” (Project Nimbus) समझौते को लेकर लगातार विवाद होता रहा है।

यह बहु-अरब डॉलर का क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अनुबंध है, जिसके तहत गूगल और अमेज़न इज़राइली सरकारी संस्थानों को तकनीकी सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं।

मानवाधिकार समूहों और अनेक कर्मचारियों का आरोप रहा है कि ऐसी तकनीकें निगरानी, सैन्य संचालन और फ़िलिस्तीनियों पर नियंत्रण को मजबूत करने में इस्तेमाल हो सकती हैं। हालांकि गूगल और इज़राइल दोनों इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं।

गूगल के भीतर भी कर्मचारियों ने कई बार कंपनी के इस अनुबंध का विरोध किया है। “No Tech For Apartheid” जैसे अभियानों के माध्यम से कर्मचारियों ने सवाल उठाया कि क्या तकनीकी कंपनियों को ऐसे सरकारी अनुबंधों का हिस्सा बनना चाहिए जिनका संबंध मानवाधिकार उल्लंघनों से जोड़ा जाता है।

गाज़ा युद्ध और अमेरिकी विश्वविद्यालयों में उभरता छात्र आंदोलन

अक्टूबर 2023 के बाद गाज़ा में युद्ध तेज होने के साथ ही अमेरिका के विश्वविद्यालय परिसरों में व्यापक छात्र आंदोलन देखने को मिला।

Columbia University से लेकर Harvard University, Yale University और University of California Berkeley तक, हजारों छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की कि वे उन कंपनियों और निवेश फंडों से अपने संबंध खत्म करें जो इज़राइल की सैन्य नीतियों से जुड़े हैं।

इन आंदोलनों का केंद्रीय तर्क यह रहा है कि शिक्षा संस्थानों और तकनीकी कंपनियों की भी नैतिक जवाबदेही होती है। छात्रों का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करते हैं, तो उन्हें अपने निवेश और साझेदारियों की भी समीक्षा करनी चाहिए।

युवाओं का बदलता राजनीतिक दृष्टिकोण

स्टैनफोर्ड में सुंदर पिचाई के खिलाफ हुआ विरोध एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है। यह घटना बताती है कि नई पीढ़ी केवल सरकारों से ही सवाल नहीं पूछ रही, बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भूमिका पर भी सवाल उठा रही है।

एक समय था जब तकनीकी कंपनियों को नवाचार, प्रगति और लोकतांत्रिक सूचना व्यवस्था का प्रतीक माना जाता था। लेकिन आज वही कंपनियाँ युद्ध, निगरानी तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मानवाधिकारों के सवालों के केंद्र में खड़ी दिखाई देती हैं।

युवा कार्यकर्ताओं का मानना है कि अगर कोई कंपनी अरबों डॉलर के अनुबंधों के जरिए किसी सरकार की सैन्य या निगरानी क्षमताओं को मजबूत करती है, तो उसे उसके सामाजिक और नैतिक परिणामों के लिए भी जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

कंपनियों के लिए एक चेतावनी

स्टैनफोर्ड के इस विरोध प्रदर्शन को केवल एक समारोह में हुई व्यवधान की घटना मानना भूल होगी। यह उस बढ़ती वैश्विक चेतना का हिस्सा है जिसमें युवा उपभोक्ता, छात्र और कर्मचारी बड़ी कंपनियों से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।

गाज़ा के मुद्दे पर दुनिया भर में फैले विरोध प्रदर्शनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब केवल सरकारें ही नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट संस्थाएँ भी सार्वजनिक जांच और नैतिक सवालों के दायरे में हैं।

सुंदर पिचाई के भाषण के दौरान उठे “फ्री फिलिस्तीन” के नारे इस बात का संकेत हैं कि आने वाले समय में कंपनियों को केवल अपने मुनाफे और तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अपने सामाजिक और राजनीतिक निर्णयों से भी आंका जाएगा।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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