February 10, 2026 6:24 am
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किसानों के लिए खतरे की घंटी, उंगली पकड़कर पहुंचा पकड़ेंगे ट्रंप

भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर बड़ा विवाद। जीरो टैरिफ, कृषि बाजार, GM फूड और किसानों के हितों पर उठे गंभीर सवाल। क्या यह डील भारत के हितों का सरेंडर है?

“नरेंदर का सरेंडर”: भारत-अमेरिका ट्रेड डील या किसानों और संप्रभुता की कीमत पर समझौता?

भारत और अमेरिका के बीच हुई नई ट्रेड डील को लेकर सरकार जश्न मना रही है। गोदी मीडिया ढोल-नगाड़े बजा रहा है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल इसे ऐतिहासिक बता रहे हैं। लेकिन विपक्ष, खासकर कांग्रेस, इसे एक ही नाम दे रहा है — “नरेंदर का सरेंडर”

सवाल यह है कि क्या यह सचमुच एक बराबरी की ट्रेड डील है? या फिर यह वह समझौता है जिसमें भारत ने पहली बार अपनी कृषि, अपने किसानों और अपनी आर्थिक संप्रभुता को एक अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने झुका दिया है?

डील या दबाव में लिया गया फैसला?

ट्रेड डील आमतौर पर बराबरी की मेज पर बैठकर बातचीत से तय होती है। लेकिन जिस तरह से इस डील की घोषणा हुई, वह असामान्य है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तड़के सोशल मीडिया पर लिखा कि भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा, इसलिए अमेरिका ने 25% टैरिफ घटाया है, और यह भी कहा कि अमेरिका निगरानी करेगा कि भारत चोरी-छिपे रूस से तेल न खरीदे।

अगर यह बयान सच है, तो यह किसी भी संप्रभु देश के लिए बेहद गंभीर बात है। इसका अर्थ है कि एक विदेशी शक्ति भारत की ऊर्जा नीति पर निगरानी की बात कर रही है।

पहली बार कृषि को अंतरराष्ट्रीय ट्रेड डील में खोला गया

इस डील का सबसे बड़ा और खतरनाक पक्ष कृषि क्षेत्र से जुड़ा है।

अब तक भारत ने किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते में अपने कृषि बाजार को पूरी तरह नहीं खोला था। लेकिन इस डील में:

  • कई अमेरिकी कृषि उत्पादों पर जीरो प्रतिशत टैरिफ स्वीकार किया गया है
  • फलों, नट्स, ज्वार और सोया ऑयल पर आयात शुल्क लगभग समाप्त
  • DDG (Dry Distillery Grain) — जो मक्का का बाय-प्रोडक्ट है और पशु चारे में इस्तेमाल होता है — उस पर भी शुल्क शून्य
  • सरकार कहती है मक्का शामिल नहीं है, लेकिन पिछले दरवाजे से मक्का आ गया
  • सोयाबीन नहीं, लेकिन सोया ऑयल शामिल

योगेंद्र यादव सहित कई किसान नेताओं ने इसे भारत के कृषि हितों के लिए गंभीर खतरा बताया है।

GM फूड और डेयरी नियमों में ढील की तैयारी?

संकेत यह भी हैं कि आगे चलकर:

  • GM फूड पर भारत की सख्त शर्तों में ढील दी जा सकती है
  • डेयरी उत्पादों पर वे शर्तें नरम हो सकती हैं जिनमें मांसाहारी पशुओं से प्राप्त उत्पादों पर रोक है

यदि ऐसा हुआ, तो यह भारतीय कृषि और उपभोक्ता सुरक्षा नीति में ऐतिहासिक बदलाव होगा।

“Zero Percent Tariff” — दुनिया में कहीं नहीं

सबसे बड़ा दावा यह किया जा रहा है कि यह एक शानदार रिसिप्रोकल डील है। लेकिन उपलब्ध विवरणों के अनुसार, दुनिया का कोई भी देश अमेरिका के साथ Zero Percent Tariff पर इस स्तर की सहमति नहीं देता।

न पाकिस्तान, न बांग्लादेश, न मलेशिया, न इंडोनेशिया।

लेकिन भारत ने यह स्वीकार किया।

25% से 18% टैरिफ की कहानी

सरकार और मीडिया यह बता रहे हैं कि अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 25% टैरिफ घटाकर 18% कर दिया। लेकिन यह नहीं बताया जा रहा कि 2024 तक इन्हीं उत्पादों पर 2-3% टैरिफ हुआ करता था।

यानी जिस चीज़ को उपलब्धि बताया जा रहा है, वह वास्तव में पहले से कहीं अधिक टैरिफ है।

किसान संगठनों का विरोध

संयुक्त किसान मोर्चा और अन्य किसान संगठनों ने इस डील का विरोध करने का आह्वान किया है। उनका कहना है कि यह भारतीय कृषि बाजार को धीरे-धीरे अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने की प्रक्रिया है।

निष्कर्ष: जश्न या चिंता?

यह डील भारत के लिए अवसर है या आत्मसमर्पण — यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन अभी उपलब्ध तथ्यों और अमेरिकी बयानों को देखें, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है:

क्या यह बराबरी की ट्रेड डील है?
या फिर यह भारत के हितों का सरेंडर है?

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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