August 15, 2026 2:11 am
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BJP का चुनावी फ़ार्मूला: SIR, हिंदू-मुस्लिम, कैश ट्रांसफ़र!

यूपी में महिलाओं को कुल 50,000 रुपये की प्रस्तावित नकद सहायता पर राजनीतिक बहस तेज। चुनाव से पहले 20,000 रुपये देने की चर्चा के बीच सवाल—महिला सशक्तीकरण या वोट साधने की रणनीति?

UP चुनाव से पहले महिलाओं के खातों में नकद राशि भेजने की चर्चा ने खड़े किए सवाल

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार की एक प्रस्तावित नकद सहायता योजना को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो सकती है। चर्चा है कि महिलाओं को स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता के नाम पर कुल 50,000 रुपये की आर्थिक सहायता देने की योजना तैयार की जा रही है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार चुनाव से पहले महिलाओं के खातों में 20,000 रुपये की पहली राशि और उसके बाद 10,000-10,000 रुपये की तीन किस्तें दी जा सकती हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या इसे महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण कहा जाए या चुनाव से ठीक पहले मतदाताओं को प्रभावित करने की राजनीतिक रणनीति?

हमारे वीडियो कार्यक्रम में इसी मुद्दे पर चर्चा की गई कि आखिर ऐसी योजनाएं चुनावों के करीब आते ही क्यों याद आती हैं और क्या नकद हस्तांतरण अब भारतीय चुनावी राजनीति का नया बड़ा हथियार बन चुका है?

बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद यूपी?

भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकारों ने पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं को केंद्र में रखकर प्रत्यक्ष नकद सहायता की कई योजनाएं शुरू की हैं। मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना योजना, महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए नकद सहायता और बिहार में महिलाओं को सीधे आर्थिक मदद जैसी योजनाओं को चुनावी राजनीति के संदर्भ में भी देखा गया है।

आलोचकों का तर्क है कि इन योजनाओं ने एक नया राजनीतिक फॉर्मूला तैयार किया है—महिलाओं के खातों में सीधे पैसा पहुंचाइए और एक बड़े महिला वोट बैंक तक राजनीतिक पहुंच बनाइए।

उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित 50,000 रुपये की योजना को भी इसी सिलसिले की अगली कड़ी बताया जा रहा है।

अगर यह योजना लागू होती है और चुनाव से पहले 20,000 रुपये सीधे खातों में भेजे जाते हैं, तो विपक्ष के लिए यह सवाल उठाना स्वाभाविक होगा कि सरकार को महिलाओं की आर्थिक जरूरतें चुनाव से ठीक पहले ही क्यों दिखाई दीं?

अखिलेश यादव का सवाल: पिछले 10 साल में क्यों नहीं?

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पहले ही सरकार की चुनाव से पहले की जाने वाली घोषणाओं और नकद सहायता योजनाओं पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका मूल सवाल यही है कि अगर महिलाओं को आर्थिक सहायता और स्वरोजगार के लिए इतनी बड़ी रकम देना जरूरी था तो सरकार ने अपने पिछले 10 वर्षों के कार्यकाल में इसे पहले क्यों नहीं लागू किया?

यही सवाल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

क्या सरकार की नीतियां दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक जरूरतों के आधार पर बनती हैं, या चुनावी कैलेंडर देखकर?

विपक्ष का आरोप है कि चुनाव नजदीक आते ही सरकार को महिलाओं, युवाओं, बेरोजगारों और गरीबों की आर्थिक परेशानियां याद आने लगती हैं। दूसरी तरफ सरकार और उसके समर्थक ऐसी योजनाओं को महिला सशक्तिकरण, आर्थिक भागीदारी और स्वरोजगार को बढ़ावा देने वाली कल्याणकारी पहल बताते हैं।

यानी असली बहस केवल 50,000 रुपये की नहीं है, बल्कि इस योजना की टाइमिंग और इसके राजनीतिक उद्देश्य की है।

क्या नकद सहायता को ‘चुनावी रिश्वत’ कहना सही है?

यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है। सरकार द्वारा बजट और आधिकारिक योजना के तहत दी जाने वाली सामाजिक कल्याण सहायता कानूनी और नीतिगत प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है। इसलिए किसी सरकारी योजना को बिना ठोस आधार के सीधे ‘चुनावी रिश्वत’ कहना कानूनी रूप से उचित निष्कर्ष नहीं होगा।

लेकिन राजनीतिक सवाल अलग है।

अगर कोई बड़ी नकद सहायता योजना चुनाव से ठीक पहले घोषित या तेज गति से लागू की जाती है, तो विपक्ष उस पर चुनावी लाभ लेने का आरोप लगाएगा ही। हमारे कार्यक्रम में उठाया गया सवाल भी यही है कि क्या चुनाव से पहले प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण मतदाताओं को प्रभावित करने की एक नई और प्रभावी चुनावी रणनीति बन गई है?

पहले चुनावों के दौरान नकदी, शराब या दूसरी चीजें बांटने के आरोप अक्सर सामने आते रहे हैं। लेकिन अब सरकारी योजनाओं के माध्यम से सीधे बैंक खातों में पैसा पहुंचाने का मॉडल राजनीति का नया और ज्यादा संगठित चेहरा बनता दिखाई देता है।

क्या चुनाव के बाद बदल जाते हैं नियम?

विपक्ष की ओर से यह आरोप भी लगाया जाता है कि चुनाव से पहले जिन योजनाओं को बड़े पैमाने पर प्रचारित किया जाता है, चुनाव जीतने के बाद उनकी शर्तें बदल सकती हैं, पात्रता के नए नियम बनाए जा सकते हैं या लाभार्थियों की जांच का दायरा बढ़ाया जा सकता है।

ऐसे आरोपों की अलग-अलग राज्यों और योजनाओं के संदर्भ में तथ्यात्मक जांच जरूरी है। लेकिन राजनीतिक अनुभव का सवाल यह है कि क्या चुनाव से पहले किया गया वादा चुनाव के बाद भी उसी रूप में और उसी गति से लागू रहता है?

महिलाओं के लिए नकद सहायता योजनाओं का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि चुनाव से पहले खाते में कितने रुपये आए। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि—

  • क्या योजना लंबे समय तक जारी रहती है?
  • क्या हर पात्र महिला को वास्तव में लाभ मिलता है?
  • क्या सहायता की राशि महंगाई के अनुपात में पर्याप्त है?
  • क्या इससे स्थायी रोजगार या आय के अवसर पैदा होते हैं?
  • क्या योजना का उद्देश्य केवल नकद वितरण है या आर्थिक स्वावलंबन?

यूपी के खजाने में पैसा है तो शिक्षा और रोजगार का क्या?

इस पूरी बहस का सबसे बड़ा सवाल उत्तर प्रदेश के विकास मॉडल से जुड़ता है।

अगर राज्य सरकार के पास महिलाओं को हजारों करोड़ रुपये की नकद सहायता देने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, तो जनता यह भी पूछ सकती है कि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, टूटी सड़कों और दूसरी बुनियादी सेवाओं के लिए कितना खर्च किया जा रहा है?

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में युवाओं के लिए रोजगार, सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता, स्वास्थ्य व्यवस्था और बुनियादी ढांचे की समस्याएं लगातार राजनीतिक मुद्दा रही हैं।

आलोचकों का कहना है कि सरकार को केवल चुनाव से पहले पैसा बांटने के बजाय ऐसी नीतियां बनानी चाहिएं जो महिलाओं और युवाओं की स्थायी आय, रोजगार और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करें।

एकमुश्त 20,000 रुपये या कुल 50,000 रुपये की सहायता तत्काल राहत दे सकती है। लेकिन क्या इससे किसी महिला का स्थायी स्वरोजगार खड़ा होगा? यह योजना की संरचना और उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।

बीजेपी का नया चुनावी फॉर्मूला?

हमारे कार्यक्रम में एक बड़े राजनीतिक पैटर्न की ओर ध्यान दिलाया गया है। आलोचकों के मुताबिक बीजेपी की चुनावी रणनीति अब कई स्तरों पर काम करती दिखाई देती है—

पहला, मतदाता सूचियों और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे सवालों के बीच वोटरों की भागीदारी और नामों को लेकर राजनीतिक संघर्ष।

दूसरा, हिंदू-मुस्लिम और पहचान की राजनीति के जरिए मतों का ध्रुवीकरण।

तीसरा, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और नकद सहायता के माध्यम से खासतौर पर महिला मतदाताओं तक सीधी पहुंच।

इनमें से हर सवाल पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के दावे और आरोप हैं और उनका तथ्यात्मक परीक्षण जरूरी है। लेकिन इतना साफ है कि महिला मतदाता अब भारत की चुनावी राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण समूहों में शामिल हैं

और इसी कारण उनके लिए नकद सहायता, मुफ्त सुविधाएं, पेंशन, गैस, आवास और दूसरी कल्याणकारी योजनाओं की राजनीति लगातार बढ़ रही है।

महिला सशक्तीकरण या चुनावी प्रबंधन?

यूपी में प्रस्तावित 50,000 रुपये की योजना पर सबसे बड़ा सवाल शायद यही है।

अगर यह वास्तव में महिलाओं को रोजगार शुरू करने, व्यवसाय खड़ा करने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक सुविचारित योजना है, तो इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन अगर योजना का सबसे बड़ा आकर्षण चुनाव से ठीक पहले खाते में आने वाली 20,000 रुपये की राशि बन जाती है, तो राजनीतिक सवाल उठेंगे ही।

महिला सशक्तीकरण केवल खाते में पैसा डालने से पूरा नहीं होता।

इसके लिए चाहिए—

  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
  • सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार
  • समान वेतन और आर्थिक अवसर
  • छोटे कारोबार के लिए सस्ता ऋण
  • स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा
  • सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन
  • कामकाजी महिलाओं के लिए आवश्यक सुविधाएं

चुनाव से पहले नकद सहायता तत्काल लोकप्रियता दे सकती है। लेकिन असली परीक्षा यह है कि क्या चुनाव के बाद भी महिलाओं की आर्थिक स्थिति में स्थायी बदलाव आता है?

उत्तर प्रदेश में आने वाले विधानसभा चुनाव के साथ यह बहस और तेज होगी। और मतदाताओं के सामने सवाल होगा—क्या यह कल्याणकारी राजनीति है, या कल्याणकारी राजनीति के जरिए चुनावी प्रबंधन?

मुकुल सरल

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