छह साल की कैद के बीच आदिवासी इतिहास, सत्ता और प्रतिरोध के सवाल
दिल्ली के प्रेस क्लब में उमर खालिद की किताब Fractured Communities: Adivasi History and Politics of Power पर चर्चा के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे। यह किताब उमर खालिद की पीएचडी थीसिस पर आधारित है। कार्यक्रम का संदर्भ खास इसलिए भी रहा क्योंकि उमर खालिद पिछले छह वर्षों से UAPA के तहत दर्ज मामले में बतौर अंडरट्रायल जेल में हैं।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने किताब के जरिए आदिवासी इतिहास, सत्ता की संरचना, राष्ट्रवाद, शिक्षा और असहमति के सवालों पर चर्चा की। साथ ही, उमर खालिद की लंबे समय से जारी न्यायिक हिरासत को लेकर भी चिंता जताई गई।
छह साल की कैद पर सवाल
कार्यक्रम में बोलते हुए वक्ताओं ने कहा कि छह साल का समय किसी भी व्यक्ति के जीवन में बहुत लंबी अवधि होती है। उमर खालिद की गिरफ्तारी के शुरुआती दिनों को याद करते हुए एक वक्ता ने कहा कि उस समय दो साल की संभावित हिरासत भी बेहद लंबी लगती थी, लेकिन देखते-देखते छह साल बीत चुके हैं।
वक्ताओं ने कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर भरोसा है, लेकिन उमर खालिद के मामले में न्यायिक प्रक्रिया जिस तरह आगे बढ़ रही है, उसे लेकर गंभीर सवाल भी मौजूद हैं।
कार्यक्रम में यह अपील भी की गई कि Fractured Communities को अधिक से अधिक लोग खरीदें और पढ़ें, ताकि आदिवासी इतिहास और सत्ता की राजनीति से जुड़े उन सवालों पर व्यापक बहस हो सके जिन्हें किताब उठाती है।
किताब सिर्फ आदिवासी इतिहास की चर्चा नहीं
Fractured Communities का केंद्र आदिवासी इतिहास और सत्ता की राजनीति है। कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि किताब को समझने के लिए आदिवासी इतिहास के साथ-साथ इतिहास लेखन की प्रक्रिया और उसके अकादमिक ढांचे को समझना भी जरूरी है।
चर्चा में कहा गया कि किताब को पढ़ना आसान नहीं है, क्योंकि इसमें इतिहास, आदिवासी समाज और सत्ता के जटिल संबंधों पर विस्तार से विचार किया गया है। इसके लिए पाठक के पास आदिवासी इतिहास और इतिहास को एक अकादमिक अनुशासन के रूप में समझने की कुछ बुनियादी पृष्ठभूमि होना उपयोगी होगा।
वक्ताओं के मुताबिक, किताब का महत्व सिर्फ इसके लेखक की राजनीतिक पहचान के कारण नहीं, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि यह भारत में आदिवासी इतिहास को सत्ता और राजनीति के संदर्भ में देखने का प्रयास करती है।
शिक्षा और राष्ट्रवाद पर भी चर्चा
कार्यक्रम में मौजूदा शिक्षा व्यवस्था और राष्ट्रवाद के बीच संबंध पर भी सवाल उठाए गए।
एक वक्ता ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि स्कूलों में भूगोल जैसे विषयों को एक खास राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से पढ़ाया जाता है, तो विश्वविद्यालय में पहुंचने वाले छात्रों के सामने अलग-अलग विचारधाराओं और दृष्टिकोणों के बीच तनाव पैदा होना स्वाभाविक है।
उन्होंने सवाल उठाया कि शिक्षा के जरिए समाज में पैदा की जा रही असमानताओं और वैचारिक विभाजनों से कैसे निपटा जाए।
चर्चा में यह तर्क भी सामने आया कि सामाजिक और राजनीतिक बदलाव केवल किताब लिखने या किताब पढ़ने से संभव नहीं होगा। वक्ता के मुताबिक, इसके लिए मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक ढांचे पर व्यापक सवाल उठाने की जरूरत है।
‘मौजूदा राजनीतिक ढांचे के पास समाधान नहीं’
कार्यक्रम में एक वक्ता ने कहा कि देश जिस राजनीतिक और सामाजिक ‘पैराडाइम’ में रह रहा है, उसे तोड़ने का समाधान केवल स्थापित राजनीतिक दलों के पास नहीं है।
उन्होंने दुनिया के छात्र आंदोलनों का उदाहरण देते हुए कहा कि युवाओं और छात्रों के आंदोलनों ने कई देशों में सामाजिक और राजनीतिक बदलावों को प्रभावित किया है।
उनका कहना था कि भारत में भी स्कूलों और विश्वविद्यालयों से निकलने वाली नई पीढ़ी अगर इतिहास, भूगोल और राष्ट्र की अवधारणा को आलोचनात्मक तरीके से समझेगी, तो वह मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था से अलग सवाल पूछ सकती है।
उमर खालिद की किताब और जेल के बीच संबंध
कार्यक्रम में उमर खालिद की अकादमिक यात्रा और उनकी मौजूदा कानूनी स्थिति को एक साथ रखकर देखा गया।
वक्ताओं ने कहा कि उमर खालिद की किताब पर चर्चा केवल एक अकादमिक किताब पर चर्चा नहीं है। यह उस समय हो रही है जब इसके लेखक छह वर्षों से जेल में हैं और उनका मुकदमा अभी पूरा नहीं हुआ है।
एक वक्ता ने कहा कि उमर खालिद के मामले को केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। उनके मुताबिक, इसके पीछे विचार, असहमति और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े बड़े सवाल भी हैं।
कार्यक्रम में एक वक्ता ने दावा किया कि भारत में मुस्लिम समुदाय के भीतर खास तौर पर सवाल पूछने और आलोचनात्मक तरीके से सोचने वाले लोगों को लेकर एक असुरक्षा का माहौल बनाया गया है। यह वक्ता की राजनीतिक व्याख्या थी, जिस पर कार्यक्रम में व्यापक चर्चा हुई।
कविता के जरिए उमर खालिद का जिक्र
कार्यक्रम के अंत में उमर खालिद की गिरफ्तारी और उनकी जेल यात्रा का जिक्र एक कविता के जरिए किया गया। कविता में अदालत, जेल, आजादी और इंसाफ के सवाल उठाए गए।
कविता की पंक्तियों के जरिए यह सवाल सामने रखा गया कि किसी व्यक्ति को किस अपराध के लिए इतने लंबे समय तक हिरासत में रखा जा रहा है और उसकी आजादी पर पाबंदी का आधार क्या है।
कार्यक्रम का समापन इसी सवाल के साथ हुआ कि “हमारी आजादी कहां है?”
किताब पढ़ने की अपील
प्रेस क्लब में हुई इस चर्चा का एक महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि Fractured Communities: Adivasi History and Politics of Power को केवल उमर खालिद की व्यक्तिगत या राजनीतिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए।
किताब आदिवासी इतिहास, सत्ता की राजनीति और भारतीय समाज में मौजूद असमानताओं पर बहस का एक अकादमिक आधार प्रस्तुत करती है। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने इसे पढ़ने और इसके निष्कर्षों पर स्वतंत्र रूप से विचार करने की अपील की।
छह साल से जेल में बंद एक अंडरट्रायल के लेखक की किताब पर राजधानी में हुई यह चर्चा इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण रही कि इसमें किताब के अकादमिक विषयों के साथ-साथ न्याय, असहमति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे सवाल भी केंद्र में रहे।
