August 12, 2026 3:06 pm
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अडानी के लिए अमेरिका से राहत, महाराष्ट्र में जंगल की जमीन

गौतम अडानी के खिलाफ अमेरिका में रिश्वत-फ्रॉड का आपराधिक केस खारिज हुआ। महाराष्ट्र में अडानी समूह की परियोजनाओं के लिए करीब 83,700 वर्ग फुट वन भूमि मंजूर होने पर उठे सवाल।

किसकी कृपा से एक ही समय पर मिल रही हैं दो बड़ी ‘खुशखबरियां’

अमेरिका में गौतम अडानी के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले का अंत और महाराष्ट्र में अडानी समूह की दो परियोजनाओं के लिए करीब 83,700 वर्ग फुट वन भूमि के डायवर्जन की मंजूरी—इन दो घटनाओं ने एक बार फिर अडानी समूह और नरेंद्र मोदी सरकार के रिश्तों को लेकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है।

एक तरफ अमेरिका की अदालत में अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी के खिलाफ रिश्वत और धोखाधड़ी से जुड़े आपराधिक आरोपों को खारिज कर दिया गया। दूसरी तरफ महाराष्ट्र सरकार ने अडानी समूह की दो परियोजनाओं के लिए रायगढ़ और अमरावती में वन भूमि के इस्तेमाल की अनुमति दी है। इनमें रायगढ़ की जमीन का एक हिस्सा रिजर्व फॉरेस्ट और मैंग्रोव क्षेत्र से जुड़ा है।

इन दोनों घटनाओं को लेकर सवाल यही है—क्या यह महज दो अलग-अलग प्रशासनिक और कानूनी घटनाएं हैं, या इनके राजनीतिक और कारोबारी असर को एक साथ देखा जाना चाहिए?

अमेरिका में अडानी के खिलाफ केस हुआ खत्म

10 अगस्त 2026 को अमेरिका के न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट के जज निकोलस गरॉफ़िस ने गौतम अडानी और सागर अडानी के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामले को खारिज कर दिया। यह मामला 2024 में अमेरिकी अभियोजकों द्वारा दायर किया गया था और इसमें भारतीय अधिकारियों को कथित रिश्वत देने तथा अमेरिकी निवेशकों को कथित तौर पर गुमराह करने के आरोप लगाए गए थे। अडानी समूह और आरोपितों ने आरोपों से इनकार किया था।

हालांकि, इसे सीधे तौर पर ‘क्लीन चिट’ कहना सही नहीं होगा। मामला ट्रायल या दोषसिद्धि तक नहीं पहुंचा। अमेरिकी न्याय विभाग ने अभियोजन आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया और अदालत ने आपराधिक आरोपों को खारिज कर दिया।

इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प पहलू यह है कि जज गरॉफ़िस ने मामले को खत्म करने के तरीके पर सवाल उठाए। Reuters के मुताबिक, जज ने Justice Department के एक वरिष्ठ अधिकारी ट्रेंट मैककॉट्टर द्वारा मामले को छोड़ने के फैसले में जांचकर्ताओं और ट्रायल अभियोजकों की भूमिका को दरकिनार किए जाने पर चिंता जताई।

10 अरब डॉलर के निवेश और 15 हजार नौकरियों का जिक्र क्यों आया?

अडानी मामले में अमेरिकी निवेश का मुद्दा भी खासा चर्चा में रहा है।

अडानी समूह ने अमेरिका में करीब 10 अरब डॉलर निवेश करने और लगभग 15,000 नौकरियां पैदा करने की योजना का ऐलान किया था। बाद में मीडिया रिपोर्टों में यह सवाल उठा कि क्या इस निवेश प्रस्ताव का आपराधिक मामले को खत्म करने के फैसले से कोई संबंध था।

अमेरिकी न्याय विभाग ने इस तरह के संबंध से इनकार किया। जुलाई में अडानी ने भी अमेरिकी अदालत में शपथपत्र देकर कहा था कि उन्हें किसी ऐसे ‘क्विड प्रो क्वो’ यानी सौदे की जानकारी नहीं थी जिसमें निवेश के बदले मामला खत्म करने की बात हुई हो।

यानी यहां दो बातें अलग-अलग रखना जरूरी है—अडानी के खिलाफ आपराधिक मामला खारिज हुआ है, लेकिन यह कहना कि निवेश के बदले केस खत्म किया गया, उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर स्थापित तथ्य नहीं है।

महाराष्ट्र में अडानी की दो परियोजनाओं के लिए करीब 83,700 वर्ग फुट वन भूमि

इसी बीच महाराष्ट्र से अडानी समूह से जुड़ी दूसरी बड़ी खबर सामने आई है।

महाराष्ट्र सरकार ने अडानी समूह की दो कंपनियों—Adani Cementation Limited और Adani Total Gas Limited—की परियोजनाओं के लिए करीब 83,700 वर्ग फुट वन भूमि के डायवर्जन को मंजूरी दी है।

इनमें सबसे बड़ा हिस्सा रायगढ़ जिले के अलीबाग तालुका में आने वाली जमीन का है। रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 69,933 वर्ग फुट, यानी लगभग 0.65 हेक्टेयर भूमि, शाहपुर और शाहबाज गांवों से जुड़े इलाके में है। इस जमीन में रिजर्व फॉरेस्ट के साथ-साथ नाला मैंग्रोव और क्रीक मैंग्रोव वन क्षेत्र भी शामिल हैं।

यह जमीन अडानी सीमेंटेशन की प्रस्तावित रायगढ़ सीमेंट बल्क टर्मिनल परियोजना से जुड़ी है। इसके लिए बर्थिंग जेट्टी, कन्वेयर कॉरिडोर और उससे संबंधित सुविधाओं तथा पहुंच मार्ग के लिए भूमि के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है।

अमरावती में अडानी टोटल गैस को 13,788 वर्ग फुट जमीन

दूसरी मंजूरी Adani Total Gas Limited के लिए है।

इसके तहत करीब 13,788 वर्ग फुट, यानी लगभग 0.13 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन की अनुमति दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस जमीन का इस्तेमाल अमरावती शहर और आसपास के क्षेत्रों में प्राकृतिक गैस वितरण नेटवर्क के लिए भूमिगत स्टील पाइपलाइन बिछाने में किया जाना है।

दोनों मंजूरियों को मिलाकर भूमि का क्षेत्रफल करीब 0.78 हेक्टेयर, यानी लगभग 83,700 वर्ग फुट या 1.9 एकड़ बैठता है।

सवाल सिर्फ जमीन का नहीं, मैंग्रोव और पर्यावरण का भी है

रायगढ़ की मंजूरी इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां इस्तेमाल होने वाली जमीन के एक हिस्से का संबंध मैंग्रोव क्षेत्र से है।

मैंग्रोव तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। वे तटीय इलाकों को कटाव और तूफानी प्रभावों से बचाने, जैव विविधता को सहारा देने और कार्बन को संग्रहीत करने में भूमिका निभाते हैं।

इसीलिए रिजर्व फॉरेस्ट और मैंग्रोव क्षेत्र में किसी औद्योगिक परियोजना के लिए भूमि डायवर्जन का सवाल सिर्फ जमीन के आकार से तय नहीं होता। असली सवाल यह होता है कि उस परियोजना का पर्यावरणीय असर क्या होगा, किन शर्तों पर मंजूरी दी गई है और पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए क्या कदम तय किए गए हैं।

सरकारी आदेशों में वन अधिकारियों को डायवर्जन की गई जमीन तक निर्बाध पहुंच जैसी शर्तें भी शामिल बताई गई हैं। नियमों का पालन नहीं होने पर अनुमति वापस लिए जाने की व्यवस्था भी रखी गई है।

क्या दोनों घटनाओं को एक साथ जोड़ना सही है?

यहीं से राजनीतिक बहस शुरू होती है।

अडानी समूह के आलोचक इन दोनों घटनाओं को एक व्यापक तस्वीर के हिस्से के तौर पर देखते हैं—एक तरफ अमेरिका में एक बड़ा आपराधिक मामला खत्म हो रहा है और दूसरी तरफ भारत में अडानी समूह को महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लिए सरकारी मंजूरियां मिल रही हैं।

लेकिन पत्रकारिता की दृष्टि से दोनों घटनाओं के बीच सीधे किसी सौदे या राजनीतिक लेन-देन का दावा करना उपलब्ध तथ्यों से आगे जाना होगा।

अमेरिकी मामले में Justice Department ने आरोपों को आगे न बढ़ाने के पीछे कानूनी और अभियोजन संबंधी कारण बताए हैं और निवेश प्रस्ताव को फैसले का आधार मानने से इनकार किया है। दूसरी ओर, महाराष्ट्र में वन भूमि का डायवर्जन सरकारी आदेशों और निर्धारित शर्तों के तहत हुआ है।

इसलिए असली सवाल यह है कि क्या नियम सभी कंपनियों पर समान तरीके से लागू होते हैं? और क्या पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील जमीन के इस्तेमाल के मामले में सार्वजनिक हित, पर्यावरणीय प्रभाव और कारोबारी हितों के बीच संतुलन पर्याप्त रूप से सुनिश्चित किया गया है?

अडानी के लिए राहत, लेकिन सवाल अभी बाकी

गौतम अडानी के लिए अमेरिकी आपराधिक मामले का खत्म होना निश्चित रूप से एक बड़ी कानूनी राहत है। लेकिन इसे अदालत द्वारा आरोपों के गलत साबित होने की घोषणा के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। दूसरी ओर, महाराष्ट्र में अडानी समूह की परियोजनाओं के लिए वन भूमि डायवर्जन की मंजूरी भी अपने आप में यह साबित नहीं करती कि किसी नियम का उल्लंघन हुआ है।

फिर भी दोनों घटनाएं इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे एक ही बड़े सवाल की ओर इशारा करती हैं—भारत में बड़े कॉरपोरेट समूहों को मिलने वाली कानूनी और प्रशासनिक राहतों की निगरानी कितनी पारदर्शी है?

और जब मामला रिजर्व फॉरेस्ट और मैंग्रोव जैसे संवेदनशील पर्यावरणीय संसाधनों का हो, तो सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि जमीन कितनी है। सवाल यह भी होना चाहिए कि उस जमीन की पर्यावरणीय कीमत कितनी है और उसकी भरपाई कैसे होगी।

यही वह बहस है जिसे अमेरिका में अडानी मामले के खत्म होने और महाराष्ट्र में वन भूमि डायवर्जन की मंजूरी—दोनों घटनाओं के बाद नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भाषा सिंह

1971 में दिल्ली में जन्मी, शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। 1996 से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।
'अमर उजाला', 'नवभारत टाइम्स', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'नेशनल हेराल्ड', 'न्यूज़क्लिक' जैसे
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों

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